सोमवार, 27 नवंबर 2017

शुभ..मंगल..सावधान


हमारे षोडश सँस्कारों में "विवाह" एक अति महत्त्वपूर्ण व मुख्य सँस्कार माना गया है। क्या आप जानते हैं कि विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय किन दोषों का गँभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है? यदि नहीं, तो आईए आज हम आपको बताते हैं कि विवाह मुहूर्त्त निकालते समय किन प्रमुख दोषों का त्याग करना चाहिए।

"लत्तादोष"-

विवाह का दिन निर्धारण करते समय "लत्तादोष" का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। "लत्तादोष" का निर्धारण नक्षत्र एवं ग्रहों की स्थिति से होता है। जैसा कि "लत्ता" नाम से स्पष्ट इसका आशय ग्रहों की लात से होता है। सूर्य जिस नक्षत्र पर होता है उससे आगे के बारहवें नक्षत्र पर, मंगल तीसरे पर, शनि आठवें पर एवं गुरू छठवें नक्षत्र पर लात मारता है। ठीक इसी प्रकार कुछ ग्रह अपने से पिछले नक्षत्र पर लात मारते हैं जैसे बुध सातवें, राहु नौवें, चन्द्र बाईसवें, शुक्र पांचवे नक्षत्र पर लात मारता है। राहु वक्री होने के कारण इसकी गणना अगले नक्षत्र को मानकर ही की जाती है। "लत्तादोष" में विवाह के नक्षत्र से गणना कर नक्षत्रों में स्थित ग्रहों का विवेचन कर उनकी "लत्ता" का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी ग्रहों की "लत्ता" को अशुभ माना जाता है किन्तु कुछ विद्वान केवल पाप व क्रूर ग्रहों की "लत्ता" को ही त्याज़्य मानते हैं। अत: विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय "लत्तादोष" का विवेचन अवश्य करें।

"वेध" दोष-

विवाह में "वेध दोष" को सर्वत्र वर्जित माना गया है। यदि विवाह मुहूर्त्त वाले दिन "वेध दोष" हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। "वेध दोष" का निर्धारण में पंचांग में दिए "पंचशलाका" व "सप्तशलाका" चक्र का परीक्षण कर होता है। विवाह के अतिरिक्त "वेध दोष" को वरण एवं वधूप्रवेश के लिए भी त्याज्य माना गया है। शास्त्रानुसार एक रेखा में आने वाले नक्षत्रों का परस्पर वेध माना गया है। विवाह नक्षत्र का जिस भी नक्षत्र के साथ "वेध" हो यदि उस नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो इसे "वेध-दोष" माना जाएगा। जैसे पंचांग में दिए सप्तशलाका चक्र में "रेवती" नक्षत्र का "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र के साथ वेध है। अब यदि विवाह का नक्षत्र "रेवती" है तो "वेध दोष" निवारण के लिए "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए, यदि उत्तरा-फ़ाल्गुनी नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हुआ तो यह "वेधदोष" माना जाएगा। विवाह में यह दोष सर्वत्र विचारणीय व त्याज्य है।

"जामित्र दोष"-

ज्योतिष शास्त्र में सप्तम भाव से दाम्पत्य सुख एवं जीवनसाथी का विचार किया जाता है। इसे "जाया" भाव या "जामित्र" भाव कहा जाता है। इस भाव से सम्बन्धित दोष को "जाया दोष" या "जामित्र" दोष कहते हैं। "जामित्र" दोष में विवाह करना सर्वथा घातक होता है। इसके फ़लस्वरूप भावी दम्पत्ति दाम्पत्य सुख से वंचित रह सकते हैं। विवाह मुहूर्त्त में लग्न का निर्धारण करते समय यदि चन्द्र लग्न या लग्न से सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह; चाहे वह पूर्ण चन्द्र ही क्यों ना हो, स्थित हो तो इसे "जामित्र" दोष कहा जाता है। इस दोष विवाह में करना घातक होता है। अत: विवाह लग्न का निर्धारण करते समय "जामित्र" दोष का परीक्षण कर इसे त्यागना उचित व हितकर रहता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 18 नवंबर 2017

’पद्मावती" का रण


किरीतार्जुन शास्त्र का एक वाक्य है- "यद्यपि शुद्धम् लोकविरूद्धम् ना करणीयम् ना आचरणीयम्" अर्थात् यदि कोई बात सत्य व शुद्ध भी हो लेकिन समाज के विरुद्ध हो तो उसे व्यवहार में नहीं लाना चाहिए। इन दिनों संजय लीला भंसाली की फ़िल्म को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। राजपूत समाज, राजपरिवार व करणी सेना सहित कई क्षत्रिय संगठन इस फ़िल्म का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। क्षत्रिय संगठनों का उनका आरोप है कि भंसाली ने उनके इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है वहीं फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली इस बात से साफ़ इनकार कर रहे हैं। बहरहाल, ताज़ा जानकारी के अनुसार सेंसर बोर्ड ने भंसाली का आवेदन अधूरा होने के कारण फ़िल्म को वापस लौटा दिया है। सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली के अनुसार अब फ़िल्म को जनवरी 2018 में प्रमाण-पत्र मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म "पद्मावती" अब जनवरी 2018 में ही रिलीज़ हो पाएगी। फ़िल्म रिलीज़ होगी भी या नहीं यह सेंसर बोर्ड को तय करना है लेकिन इससे पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म "पद्मावती" को बनाने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्योंकि कुछ पत्रकार व विद्वान बार-बार कह रहे हैं कि जौहर का महिमामण्डन नहीं होना चाहिए। जहाँ तक रानी "पद्ममिनी" की प्रसिद्धि का प्रश्न है तो उनकी प्रसिद्धि ही जौहर (वीरतापूर्वक आत्मबलिदान) के कारण है फ़िर तो भंसाली स्वयं जौहर का महिमामण्डन कर रहे हैं। फ़िल्म कोई नवीन ऐतिहासिक जानकारी भी प्रदान नहीं करती। रानी "पद्ममिनी" की कहानी सभी को पता है। वहीं फ़िल्म (जैसा कि ट्रेलर देखकर लगा) रानी "पद्ममिनी" की गरिमा को कम अवश्य करती नज़र आ रही है। इस फ़िल्म को लेकर देश के साथ-साथ बालीवुड भी दो धड़ों में बँटा नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग विरोध। इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्ममिनी का कोई दृश्य नहीं है। यह बात भले ही सत्य हो लेकिन जैसा फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया जा रहा है उसे देखकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई समाज या स्वयं इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपने पूर्वजों का प्रणय-दृश्य देखना पसन्द करेंगे? नहीं ना...। कोई भी सभ्य व्यक्ति या समाज अपने आराध्य व मान्य पूर्वजों का "प्रणय-दृश्य" देखना पसन्द नहीं करेगा। अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्ममिनी के दृश्यों की बात बहुत दूर की है। जहाँ तक राजपरिवारों की गरिमा व मर्यादा की बात है तो "पद्ममिनी" का अभिनय करने वाली अभिनेत्री के राजा रतनसिंह का चरित्र निभाने वाले अभिनेता के साथ दिखाए गए "प्रणय-दृश्य" भी आपत्तिजनक है। यदि भंसाली की नीयत इतनी ही साफ़ थी तो उन्होंने सेंसर बोर्ड को दिए अपने आवेदन-पत्र में फ़िल्म के "ऐतिहासिक या काल्पनिक" वाला स्थान (कालम) रिक्त क्यों छोड़ा? वे इस फ़िल्म को एक "काल्पनिक" फ़िल्म बताकर विवाद समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब आप किसी के पूर्वजों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उनकी सहमति आवश्यक है। क्योंकि आप इतिहास से छेड़छाड़ करने के अधिकारी नहीं हैं फ़िर चाहे वह इतिहास किसी देश का हो या किसी राजपरिवार का। मेरे देखे अब समय आ गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के लिए सेंसर बोर्ड के अन्तर्गत उप-समीतियाँ गठित होनी चाहिए। जैसे इतिहासकारों की समीति, धर्मगुरूओं की समीति...क्योंकि इन मुद्दों पर आधारित फ़िल्मों की पटकथा को परखने के लिए इन क्षेत्रों के विद्वानों की राय व अनुशंसा महत्त्वपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

पिता की पाती


मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम,
मेरे घर की शान मेरी मुस्कान हो तुम,
मेरा मान हो; सम्मान हो तुम,
तुम हो प्राणवायु मेरी,
मेरे सारे अरमान हो तुम।
तुम मरी पहचान हो,
मेरे लिए वरदान हो तुम,
भगवान का अहसान है
मेरे घर विराजमान हो तुम,
तुम सदा हँसती रहो
सदा सुखी रहो,
मेरा सारा जहान हो तुम।
मेरी आयु तुम्हें मिल जाए
मेरे लिए भगवान हो तुम,
मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम॥

- तेजमोहन पटेल, होशंगाबाद (म.प्र.)
(सहा. पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी)

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

नेताजी का कमरा


कोलकाता के एल्गिंन रोड स्थित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के घर का वह कमरा जिससे उन्होंने 16-17 जनवरी 1941 की मध्यरात्रि "महानिष्क्रमण" किया था।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

चाहत

तुम मुझसे बात न करो
और मैं तुमसे मिल न पाऊँ
इसकी रत्ती भर शिकायत नहीं मुझे
लेकिन, कम से कम इतना तो चाहती हूँ
कि तुम्हारी गँध इन हवाओं में बरकरार रहे,
तुम्हारा स्पर्श यूँ ही छूता रहे,
फ़ूलों, दरख़्तों, छायाओं, लहरों पर।
तुम्हारी मन्द मुस्कान और आँखों की नमी,
चाँद-तारों सी टँकी रहे आसमान पर,
तुम्हारी थिरकती उँगलियों से
उठती हुई ताल बजती रहे,
मेरे आस-पास।
तुम्हारा गीत गूँजता रहे दिशाओं में,
बस...इतना ही तो चाहती हूँ मैं।

-रोज़लीन, करनाल (हरियाणा)

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...


जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पँख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,
स्वयँ धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

तुमको दीप जलाना होगा

चहुँओर अँधियारा है
दिनकर भी थक हारा है
लेकिन मेरी देहरी पर
उजियारे को लाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

तन्हाई का डेरा है
दु:ख ने किया बसेरा है
इस भीषण दावानल में
अपना हाथ बढ़ाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

बहुत दूर किनारा है
प्रतिकूल नदी की धारा है
भँवर में फँसी नैया की
अब पतवार चलाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा....

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया