गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

जय हो नर्मदा मैया...


वाह रे वाह मेरे भैया, जय हो नर्मदा मैया...
खोद दिया नगर सारा नर्मदाजल के नाम पर,
जनता को हैं लूट रहे थोथे विकास के काम पर।
पहले ही क्या माँ रेवा का आँचल साफ़-स्वच्छ रहा है!
शहर के गन्दे नालों का पानी निर्बाध उसमें बहा है।
अब वही दूषित जल जनता को पिलाओगे
हाय! नर्मदाजल घर के शौचालयों में डलवाओगे
माँ रेवा की खोह तो आज तक ना भरने पाई
रेत खोदने लेकिन तट पर मशीनें चलवाईं
इस पर भी अच्छे दिनों का दे रहे झूठा दिलासा
भ्रष्टाचार हुआ कितना बाद में होगा खुलासा
विकास हेतु निरीह जनों के सिर पर कर चढ़ा है
रातों-रात झट से देखो सम्पत्ति-कर बढ़ा है
कौन जाने विकास या विनाश की ये परिभाषा
जनता समझ ना पाती है राजनीति की भाषा
बस निवेदन है इतना चैन से जन को रहने दो
माँ रेवा का जल उसके अंक में कलकल बहने दो
शिखर चढ़ी धूल भी क्षण भर को तो इठलाती है
पवन के इक झोंके से लेकिन धूलधूसरित हो जाती है
फिर लोकतन्त्र में "दिनकर" की कविता पुन: दुहराती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

’अप्पा सो परमप्पा‌’


आज बुद्ध और महावीर के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई। बुद्ध और महावीर दोनों ही ने परमात्मा को इनकार कर दिया था। महावीर ने तो यहाँ तक कहा कि -"अप्पा सो परमप्पा" अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। वहीं बुद्ध का प्रसिद्ध वचन है -"अप्प दीपो भव:" अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। बौद्ध और जैन दोनों ही दर्शनों में आत्मा के ऊपर किसी आकाशीय परमात्मा स्वीकार नहीं है। मेरे देखे यह उचित ही है। हमारे सनातन धर्म में आत्मा के ऊपर परमात्मा को स्वीकार किया गया है। इसका आशय यह नहीं कि बुद्ध और महावीर परमात्म तत्व से अपरिचित थे, नहीं.. कदापि नहीं, वे भलीभाँति परिचित थे किन्तु उन्होंने जनमानस को आत्मा पर ही रोके रखा क्योंकि वे जानते थे कि जो आत्मा को जानने में सक्षम हो गया वह परमात्मा से साक्षात्कार कर ही लेगा। यदि आत्मा को जाने बिना परमात्मा को समझने का प्रयास किया तो वह झूठ होगा। वर्तमान में हमारे कई तथाकथित साधु-सन्तों द्वारा अपने निजी स्वार्थ व लाभ के लिए परमात्मा के नाम पर झूठ को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया गया है। आखिर ये कैसे सम्भव है कि देश में धर्मगुरूओं व धार्मिक आयोजनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे और समाज आध्यात्मिक रूप से कँगाल होता रहे? इस समस्या का मुख्य कारण है परमात्मा के नाम पर फ़ैलाया गया झूठ और फ़रेब। जब तक असल प्रचलन में है तभी तक नकल की सँभावना होती है जब असल ही विदा हो जाता है तो समाज में नकल का कोई स्थान नहीं रहता। ये हमने अभी कुछ ही वर्षों पूर्व "विमुद्रीकरण" (नोटबन्दी) के रूप देख लिया है। बुद्ध और महावीर ने यही किया था, मनुष्य से उसका आकाशीय परमात्मा छीन कर उसे उसी के अन्दर प्रतिष्ठित आत्मा पर ला खड़ा किया था। क्योंकि जब परमात्मा से ही इनकार कर दिया जावेगा तो कोई व्यक्ति, बाबा या सन्त अपने परमात्मा होने का दावा करेगा कैसे! स्वर्ग-नर्क की बात तो फ़िर बेमानी ही समझिए, जिसके नाम पर लोगों को डराया या प्रलोभन दिया जाता है। यहाँ मुझे स्मरण आता है प्रबुद्ध महिला सन्त राबिया का जो सदैव अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी का पात्र रखती थी और पूछने पर कहती थी कि "मैं मशाल से स्वर्ग में आग लगा दूँगी और नर्क को पानी में डुबो दूँगी। आशय बहुत स्पष्ट है कि स्वर्ग-नर्क, परमात्मा के नाम पर जो खेल चल रहा है उसे समाप्त करना ही सच्चे सन्त का लक्षण है। जो धर्मगुरू धर्म के नाम पर झूठ के इस जाल को काटने के स्थान पर और अधिक बुनता है उसे धर्मगुरू या उपदेशक कहना सर्वथा अनुचित है। जब तक ऐसे तथाकथित धर्मगुरू व उपदेशक समाज में रहेंगे तब तक आम आदमी का इस प्रकार के फ़र्जी बाबाओं के चँगुल से मुक्त हो पाना मुश्किल है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया


रविवार, 17 दिसंबर 2017

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा आपका भाग्य..!


अंग्रेजी नववर्ष 2018 आने वाला है। नववर्ष के आगमन के हर्ष के साथ सभी को उत्सुकता है कि उनके लिए यह नववर्ष कैसा रहेगा? समाचार-पत्रों, न्यूज़ चैनलों इत्यादि पर ज्योतिषाचार्यों, टैरोकार्ड रीडर, अंक ज्योतिषियों की आपका भविष्य बताने वाली गणनाएँ प्रसारित हो रही हैं। जिनकी राशि या मूलाँक में शुभफ़ल बताया जा रहा है वे प्रफ़ुल्लित हैं वहीं अशुभ फ़ल वाले जातक मायूस हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से आपके भविष्य में कोई बड़ा परिवर्तन या बदलाव नहीं आता है। आप जिसे वर्षफ़ल समझ रहे है वह केवल "गोचर" गणना है। जो प्रतिमाह परिवर्तित होती है। कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने के अवसर पर "वर्षफ़ल" के नाम पर जातक के पूरे वर्ष का फ़लित बताना उचित नहीं है क्योंकि गोचर आधारित गणनाएँ प्रतिमाह परिवर्तित होती रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र में "गोचर" का महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन जातक का भविष्यफ़ल बताने में इसकी गणनाओं को 10 से 15 फ़ीसदी ही मूल्य दिया जाता है। फ़िर वर्षफ़ल क्या होता है? सही मायने में "वर्षफ़ल" आपके प्रत्येक जन्मदिन से परिवर्तित होता है ना कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से। इसमें आपके नवीन वर्ष की "वर्ष-कुण्डली" बनाकर आपका वर्षफ़ल बताया जाता है। किसी जातक का भविष्यफ़ल बताने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक उसकी जन्मपत्रिका के मुख्य व महत्त्वपूर्ण शुभाशुभ योग, ग्रहस्थिति, विंशोत्तरी दशाएँ, योगिनी दशाएँ, गोचर, और अन्त में उस जातक का वर्षफ़ल होते हैं। वर्षफ़ल में "मुँथा" एवं "मुँथेश" का विशेष महत्त्व होता है। "मुँथा" एवं "मुँथेश" की स्थिति का जातक के वर्षफ़ल में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

मुँथा का निर्धारण- 

जातक की जन्मलग्न सँख्या में उसकी वर्तमान आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उस राशि की "मुँथा" होती है। "मुँथा" राशि के स्वामी ग्रह को "मुँथेश" कहते हैं।

मुँथा की स्थिति-

यदि जातक की वर्षकुण्डली में "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 4.6.८.12 स्थानों में स्थित हो एवं पाप ग्रहों से दृष्ट हो जातक को उस वर्ष कष्ट एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वहीं यदि "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 2.3.9.12 में हो तो यह शुभ होती है। जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम् राशि का वर्षलग्न अशुभ होता है।
"वर्षफ़ल" का विषय अत्यन्त वृहद् व विस्तृत है। हमने यहाँ वास्तविक वर्षफ़ल का परिचय कराने के उद्देश्य मात्र से उपर्युक्त सँक्षिप्त जानकारी आप पाठकों को दी है। अत: यदि कैलेण्डर के वर्षफ़ल बदलने पर किसी भविष्यवक्ता की गणना आपके पक्ष में नहीं है या आपकी राशि के लिए उसका फ़ल अशुभ है तो चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारा विश्वास है कि अब आप "वर्षफ़ल" के विषय में भलीभाति जान गए होंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astrpoint_hbd@yahoo.com

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

क्या कहते हैं राहुल गाँधी के सितारे


18 दिसम्बर को गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनावी परिणाम आने वाले हैं। इन परिणामों का असर इन चुनावों में भाग लेने वाले प्रत्याशियों व दलों के अतिरिक्त एक और खास व्यक्ति पर पड़ेगा वह है काँग्रेस के नव-नियुक्त अध्यक्ष राहुल गाँधी। आईए ज्योतिष की दृष्टि से जानने का प्रयास करते हैं कि आने वाला समय राहुल गाँधी के लिए कैसा रहेगा। राहुल गाँधी की कुण्डली मकर लग्न की है जिसके अधिपति शनि हैं। शनि सत्ता का कारक होता है। राहुल गाँधी की जन्मपत्रिका शनि लग्नेश होने के कारण अति-महत्त्वपूर्ण ग्रह है। राहुल गाँधी की राशि वृश्चिक है जिसके अधिपति मँगल हैं। राहुल गाँधी की जन्मपत्रिका में शनि केन्द्र में नीचराशिस्थ होकर विराजमान है जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने जीवन में अतिशय सँघर्ष व परिश्रम के बाद भी अपेक्षित सफ़लता प्राप्त नहीं होती है। यहाँ शनि की उच्च दृष्टि कर्मक्षेत्र पर है जो कि शुभ है। इस योग के कारण राहुल गाँधी अधीनस्थ के स्थान पर नेतृत्व में सफ़ल होते नज़र आ रहे हैं। राहुल गाँधी की कुण्डली कर्मक्षेत्र का कारक शुक्र शत्रुक्षेत्री है। इसके परिणामस्वरूप उन्हें सत्ता प्राप्ति में अवरोध व विलम्ब होगा। अथक परिश्रम के बाद भी वे अपेक्षित सफ़लता से दूर रहेंगे वहीं सप्तम स्थान में अकेला शुक्र व नीचराशिस्थ सप्तमेश उन्हें दाम्पत्य सुख से वँचित कर रहा है। चतुर्थेश मँगल छठे भावगत होने के कारण उन्हें जनमानस में लोकप्रियता से वँचित कर रहा है। दिवीय स्थान में राहु उन्हें पारिवारिक सुख प्राप्त करने एवं श्रेष्ठ वक्ता बनने में बाधक है। सप्तमेश के नीचराशिगत होने के कारण उन्हें साझेदारी एवं गठबन्धन से लाभ नहीं होगा। वर्तमान में राहुल गाँधी चन्द्र की महादशा व लग्नेश की अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं। इसके अतिरिक्त वे शनि की साढ़ेसाती के अन्तिम चरण को भोग रहे हैं शनि लग्नेश होने के कारण शुभ हैं। जुलाई 2017 से राहुल गाँधी लग्नेश शनि की अन्तर्दशा के प्रभाव में है यह दशा उनके लिए शुभ है जिसके चलते वे संगठन के उच्चतम पद पर आसीन हुए हैं। भले ही हाल के चुनावों में वे सत्ता से दूर रहेंगे किन्तु आने वाले दो वर्षों में उनका राजनीतिक भविष्य एक सकारात्मक मोड़ लेता प्रतीत हो रहा है। आने वाले दिनों में उनके नेतृत्व में काँग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की ओर अग्रसर होती नज़र आ रही है लेकिन सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें अभी लम्बा सँघर्ष एवं प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
भारत

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

मुख्यमंत्री की यात्राएँ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिन्हें प्रदेशवासी प्यार से ’मामा’ कहते हैं, उनका चुनावी तैयारी का अँदाज़ ही निराला है। वे चुनावी यात्रा निकालने में बड़े माहिर है और मजे की बात यह कि वे इस प्रकार की यात्राएँ धर्म के नाम पर करते हैं। पहले "नर्मदा सेवायात्रा" और अब "एकात्म यात्रा"। इन यात्राओं का उद्देश्य वैसे तो धार्मिक बताया जाता है लेकिन असल में ये होतीं चुनावी यात्राएँ ही हैं। इन यात्राओं के प्रचार-प्रसार में करोड़ों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं केवल यह जानने के लिए कि हवा का रुख़ किस तरफ़ है। ’मामा’ आप निश्चिंत रहिए जब तक मध्यप्रदेश में किसी ’मौसा’ (सशक्त विपक्ष) का आगमन नहीं होता तब तक आप मज़े से "मेरी मर्ज़ी...." वाली तर्ज पर राज कीजिए। क्योंकि आपको सत्ता के सिंहासन उतारने के लिए मुद्दों की नहीं एक ’मौसा’ की अर्थात् सशक्त विपक्षी नेतृत्व की आवश्यकता है। मुद्दे तो वैसे ही प्रदेश में भरे पड़े हैं। आपसे रेत का अवैध उत्खनन रुक नहीं रहा, कोई नया उद्योग लग नहीं रहा, मेट्रो प्रोजेक्ट लगाने वाली कम्पनी ’ज़ायका’ ने अपने ऋण की सुरक्षा ना पाकर इस प्रोजेक्ट से अपने पैर वापस खींच लिए। किसानों में नाराजगी व्याप्त है, भले किसानों पर गोली चलवा कर आप आँदोलन को दबाने में सफ़ल हो गए हों। टीकाकरण में हमारा प्रदेश बहुत पीछे है। महिलाओं के साथ हुए अपराध में मध्यप्रदेश अव्वल है। सरप्लस बिजली उत्पादन के बावजूद हमारा प्रदेश सबसे महँगी बिजली दर वाले प्रदेशों से में से एक है। ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसे कई मुद्दे हैं जो आपके माथे पर बल डालने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन जनता विवश है उसके पास ’मामा’ के रुप में आप तो हैं लेकिन विकल्प के रूप में कोई ’मौसा’ नहीं हैं अर्थात् शक्तिशाली विपक्ष। मेरे देखे विवशता और विकल्प के अभाव में होने वाली विजयश्री खोखली व हल्की होती है। जब इसी आधार पर विजयश्री की निरन्तर पुनरावृत्ति होती है तब एक दिन क्रान्ति होती है और लोकतन्त्र में स्वर गूँजता है "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..."। इससे पहले कि ये स्वर हमारे प्रदेश में गुँजायमान हो, आत्ममँथन कीजिए और अपनी कमियों में सुधार कर प्रदेश के वास्तविक विकास में सँलग्न हो जाईए। जिस दिन आप विकास के आधार पर विजयश्री प्राप्त करेंगे उसी दिन आप सही मायनों में सफ़ल माने जाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 27 नवंबर 2017

शुभ..मंगल..सावधान


हमारे षोडश सँस्कारों में "विवाह" एक अति महत्त्वपूर्ण व मुख्य सँस्कार माना गया है। क्या आप जानते हैं कि विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय किन दोषों का गँभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है? यदि नहीं, तो आईए आज हम आपको बताते हैं कि विवाह मुहूर्त्त निकालते समय किन प्रमुख दोषों का त्याग करना चाहिए।

"लत्तादोष"-

विवाह का दिन निर्धारण करते समय "लत्तादोष" का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। "लत्तादोष" का निर्धारण नक्षत्र एवं ग्रहों की स्थिति से होता है। जैसा कि "लत्ता" नाम से स्पष्ट इसका आशय ग्रहों की लात से होता है। सूर्य जिस नक्षत्र पर होता है उससे आगे के बारहवें नक्षत्र पर, मंगल तीसरे पर, शनि आठवें पर एवं गुरू छठवें नक्षत्र पर लात मारता है। ठीक इसी प्रकार कुछ ग्रह अपने से पिछले नक्षत्र पर लात मारते हैं जैसे बुध सातवें, राहु नौवें, चन्द्र बाईसवें, शुक्र पांचवे नक्षत्र पर लात मारता है। राहु वक्री होने के कारण इसकी गणना अगले नक्षत्र को मानकर ही की जाती है। "लत्तादोष" में विवाह के नक्षत्र से गणना कर नक्षत्रों में स्थित ग्रहों का विवेचन कर उनकी "लत्ता" का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी ग्रहों की "लत्ता" को अशुभ माना जाता है किन्तु कुछ विद्वान केवल पाप व क्रूर ग्रहों की "लत्ता" को ही त्याज़्य मानते हैं। अत: विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय "लत्तादोष" का विवेचन अवश्य करें।

"वेध" दोष-

विवाह में "वेध दोष" को सर्वत्र वर्जित माना गया है। यदि विवाह मुहूर्त्त वाले दिन "वेध दोष" हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। "वेध दोष" का निर्धारण में पंचांग में दिए "पंचशलाका" व "सप्तशलाका" चक्र का परीक्षण कर होता है। विवाह के अतिरिक्त "वेध दोष" को वरण एवं वधूप्रवेश के लिए भी त्याज्य माना गया है। शास्त्रानुसार एक रेखा में आने वाले नक्षत्रों का परस्पर वेध माना गया है। विवाह नक्षत्र का जिस भी नक्षत्र के साथ "वेध" हो यदि उस नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो इसे "वेध-दोष" माना जाएगा। जैसे पंचांग में दिए सप्तशलाका चक्र में "रेवती" नक्षत्र का "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र के साथ वेध है। अब यदि विवाह का नक्षत्र "रेवती" है तो "वेध दोष" निवारण के लिए "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए, यदि उत्तरा-फ़ाल्गुनी नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हुआ तो यह "वेधदोष" माना जाएगा। विवाह में यह दोष सर्वत्र विचारणीय व त्याज्य है।

"जामित्र दोष"-

ज्योतिष शास्त्र में सप्तम भाव से दाम्पत्य सुख एवं जीवनसाथी का विचार किया जाता है। इसे "जाया" भाव या "जामित्र" भाव कहा जाता है। इस भाव से सम्बन्धित दोष को "जाया दोष" या "जामित्र" दोष कहते हैं। "जामित्र" दोष में विवाह करना सर्वथा घातक होता है। इसके फ़लस्वरूप भावी दम्पत्ति दाम्पत्य सुख से वंचित रह सकते हैं। विवाह मुहूर्त्त में लग्न का निर्धारण करते समय यदि चन्द्र लग्न या लग्न से सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह; चाहे वह पूर्ण चन्द्र ही क्यों ना हो, स्थित हो तो इसे "जामित्र" दोष कहा जाता है। इस दोष विवाह में करना घातक होता है। अत: विवाह लग्न का निर्धारण करते समय "जामित्र" दोष का परीक्षण कर इसे त्यागना उचित व हितकर रहता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 18 नवंबर 2017

’पद्मावती" का रण


किरीतार्जुन शास्त्र का एक वाक्य है- "यद्यपि शुद्धम् लोकविरूद्धम् ना करणीयम् ना आचरणीयम्" अर्थात् यदि कोई बात सत्य व शुद्ध भी हो लेकिन समाज के विरुद्ध हो तो उसे व्यवहार में नहीं लाना चाहिए। इन दिनों संजय लीला भंसाली की फ़िल्म को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। राजपूत समाज, राजपरिवार व करणी सेना सहित कई क्षत्रिय संगठन इस फ़िल्म का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। क्षत्रिय संगठनों का उनका आरोप है कि भंसाली ने उनके इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है वहीं फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली इस बात से साफ़ इनकार कर रहे हैं। बहरहाल, ताज़ा जानकारी के अनुसार सेंसर बोर्ड ने भंसाली का आवेदन अधूरा होने के कारण फ़िल्म को वापस लौटा दिया है। सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली के अनुसार अब फ़िल्म को जनवरी 2018 में प्रमाण-पत्र मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म "पद्मावती" अब जनवरी 2018 में ही रिलीज़ हो पाएगी। फ़िल्म रिलीज़ होगी भी या नहीं यह सेंसर बोर्ड को तय करना है लेकिन इससे पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म "पद्मावती" को बनाने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्योंकि कुछ पत्रकार व विद्वान बार-बार कह रहे हैं कि जौहर का महिमामण्डन नहीं होना चाहिए। जहाँ तक रानी "पद्ममिनी" की प्रसिद्धि का प्रश्न है तो उनकी प्रसिद्धि ही जौहर (वीरतापूर्वक आत्मबलिदान) के कारण है फ़िर तो भंसाली स्वयं जौहर का महिमामण्डन कर रहे हैं। फ़िल्म कोई नवीन ऐतिहासिक जानकारी भी प्रदान नहीं करती। रानी "पद्ममिनी" की कहानी सभी को पता है। वहीं फ़िल्म (जैसा कि ट्रेलर देखकर लगा) रानी "पद्ममिनी" की गरिमा को कम अवश्य करती नज़र आ रही है। इस फ़िल्म को लेकर देश के साथ-साथ बालीवुड भी दो धड़ों में बँटा नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग विरोध। इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्ममिनी का कोई दृश्य नहीं है। यह बात भले ही सत्य हो लेकिन जैसा फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया जा रहा है उसे देखकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई समाज या स्वयं इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपने पूर्वजों का प्रणय-दृश्य देखना पसन्द करेंगे? नहीं ना...। कोई भी सभ्य व्यक्ति या समाज अपने आराध्य व मान्य पूर्वजों का "प्रणय-दृश्य" देखना पसन्द नहीं करेगा। अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्ममिनी के दृश्यों की बात बहुत दूर की है। जहाँ तक राजपरिवारों की गरिमा व मर्यादा की बात है तो "पद्ममिनी" का अभिनय करने वाली अभिनेत्री के राजा रतनसिंह का चरित्र निभाने वाले अभिनेता के साथ दिखाए गए "प्रणय-दृश्य" भी आपत्तिजनक है। यदि भंसाली की नीयत इतनी ही साफ़ थी तो उन्होंने सेंसर बोर्ड को दिए अपने आवेदन-पत्र में फ़िल्म के "ऐतिहासिक या काल्पनिक" वाला स्थान (कालम) रिक्त क्यों छोड़ा? वे इस फ़िल्म को एक "काल्पनिक" फ़िल्म बताकर विवाद समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब आप किसी के पूर्वजों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उनकी सहमति आवश्यक है। क्योंकि आप इतिहास से छेड़छाड़ करने के अधिकारी नहीं हैं फ़िर चाहे वह इतिहास किसी देश का हो या किसी राजपरिवार का। मेरे देखे अब समय आ गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के लिए सेंसर बोर्ड के अन्तर्गत उप-समीतियाँ गठित होनी चाहिए। जैसे इतिहासकारों की समीति, धर्मगुरूओं की समीति...क्योंकि इन मुद्दों पर आधारित फ़िल्मों की पटकथा को परखने के लिए इन क्षेत्रों के विद्वानों की राय व अनुशंसा महत्त्वपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया