बुधवार, 18 दिसंबर 2013

विदाई


सिसकी में लिपटी सदा हो रही है
कहीं कोई बेटी विदा हो रही है

चाँद-तारों से भर जाए दामन
बूढ़े पिता की दुआ हो रही है

आँगन है सूना;सूनी है देहरी
जैसे किस्मत ख़फ़ा हो रही है

वफ़ाओं का बदला चुकाएंगे कैसे
अश्कों से कीमत अदा हो रही है

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

दुख का मौसम

तेरा हाथ मेरे कांधे पर दरिया बहता जाता है
कितनी ख़ामोशी से दुख का मौसम गुज़रा जाता है

पहले ईंट;फिर दरवाजे;अबके छत की बारी है
याद नगर में एक महल था,वो भी गिरता जाता है

अपना दिल है एक परिंदा जिसके बाज़ू टूटे हैं
हसरत से बादल को देखे बादल उड़ता जाता है

सारी रात बरसने वाली बारिश का मैं आंचल हूं
दिन में कांटों पर फैलाकर मुझे सुखाया जाता है

हमने तो बाज़ार में दुनिया बेची और खरीदी है
हमको क्या मालूम किसी को कैसे चाहा जाता है

-बशीर बद्र

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

तुम्हारी भी जय-जय; हमारी भी जय-जय


सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है दिल्ली में आम आदमी पार्टी अल्पमत की सरकार बनाने को तैयार हो गई है। यदि यह खबर सत्य साबित होती है तो इस निर्णय से तीनों ही दलों ने अपने- अपने हित साधने की कोशिश करेंगे किंतु वास्तव में हित किसका सधता है ये तो समय ही बताएगा। “आप” के इस निर्णय को थोड़ा समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर आम आदमी पार्टी थोड़ा सियासी नखरा दिखाने के बाद अल्पमत की सरकार बनाने को तैयार क्यों हुई, इसके पीछे सीधा और साफ़ कारण है उसकी छवि। आम आदमी पार्टी किसी भी सूरत में अपनी बेदाग व ईमानदार छवि के साथ समझौता नहीं करना चाहती है, साथ ही साथ वह देश की जनता को यह भी बताना चाहती है कि वह सत्ता की लालची नहीं है इसलिए “आप” ने पहले सबसे बड़े दल भाजपा को आगे किया जो कि उसके पक्ष में रहा, किंतु भाजपा के इनकार के बाद अब आम आदमी पार्टी अल्पमत की सरकार बनाकर एक साथ दो निशाने साधना चाहती है पहला यह कि वह अपनी ज़िम्मेवारी से भाग नहीं रही है, दूसरा यदि भाजपा या कांग्रेस किसी जनहितैषी मुद्दे जैसे लोकायुक्त बिल लाना, विधायकों के वेतन भत्ते और सुविधाओं में कटौती करना इत्यादि को लेकर उसकी सरकार गिराते हैं तो वह जनता के बीच यह साबित करने में कामयाब हो जाएगी कि हम यदि ईमानदारी से काम करते हैं तो बीजेपी और कांग्रेस हमें करने नहीं देते इसलिए हम अल्पमत की सरकार नहीं बना रहे थे। जो भी दल “आप” की सरकार गिराएगा आने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी उसके विरूद्ध माहौल बनाएगी। अब बात भाजपा और कांग्रेस की करें तो भाजपा भी लोकसभा चुनाव से पहले किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती वहीं उसके लिए यह बात भी लाभदायक है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार बनाए क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही के पास अब तक आम आदमी पार्टी की आलोचना करने का कोई ठोस आधार नहीं है। दोनों ही दल हार्दिक रूप से यह चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी सत्ता में आए और फिर उसकी नाकामियों को आधार बनाकर ये दल उसे जनता के बीच घेरें क्योंकि किसी बीज में आए अंकुर उखाड़ फेंकना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल उस अंकुर से बने छ्तनार वृक्ष को उखाड़ फेंकना होता है। यही बात आम आदमी पार्टी पर भी लागू होती है क्योंकि “आप” के ज़्यादातर विधायक या यूं कहें कि लगभग सभी; अनुभवहीन है जिन्हें सत्ता चलाने का कोई भी अनुभव नहीं है ऐसे में जब यही विधायक मंत्री बनकर मंत्रालय की ज़िम्मेवारी संभालेंगे; नई-नई योजनाएं व योजनाओं के लिए बजट बनाएंगे तो यह बात इनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी। ऐसे में शुरूआत में शासन चलाने में आई परेशानियों और निर्णयों एवं चुनाव पूर्व किए गए वादों का ठीक ढंग से क्रियान्वयन ना कर पाना भाजपा व कांग्रेस दोनों ही के लिए संजीवनी का काम करेगा इसलिए ये दोनों ही दल चाहते हैं “आप” सरकार बनाकर एक-डेढ़ साल शासन कर ले जिससे अगले चुनावों उसके विरूद्ध प्रचार के लिए इन दोनों दलों के पास कुछ ठोस आधार व मुद्दे हों। जहां तक “आप” की सरकार गिराने की बात है तो यह कदम उचित समय पर अविश्वास प्रस्ताव के जरिये उठाया जा सकता है।
-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

किसको डालूं वोट रामजी


किसको डालूं वोट रामजी
सब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...

वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....

नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....

आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...

-हेमंत रिछारिया

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

रिक्त


मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

चुनावी माहौल

एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई
एक गुर्राया; दूजे ने पंजा बढ़ाया; तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही दृश्य दोहराया।
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लड़ाई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई।
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह" "श्वान" होता है।

-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

“गांधीजी के बंदर”

चार बंदर आपस में बात कर रहे थे। एक बोला-"गांधी बापू ने कहा है बुरा मत देखो",  दूसरा बोला-"बुरा मत सुनो",  तीसरे ने कहा-बुरा मत कहो", तभी चौथे ने कहा- "यारों, लेकिन बुरा करने से मना थोड़े किया है।" चारों बंदर खिलखिला के हँस पड़े।”

-हेमन्त रिछारिया


बुधवार, 25 सितंबर 2013

क्योंकि मैं विशिष्ट हूं...

मैं नहीं लग सकता राशन की कतारों में,
ना ही पाओगे मुझे तुम टिकिट-खिड़की के आगे;
रेल्वे-स्टेशनों या थिएटरों में,
मिलूंगा नहीं मैं तुम्हें किसी बाज़ार में,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                                                      
मैं सफ़र नहीं करता बसों में;जनरल बोगियों में,
घूमता नहीं पैदल बेफ़िक्र किसी नदी के किनारे,
ठठ्ठा मारकर हंसना नहीं तहज़ीब मेरी,
बुक्का फाड़कर रोते देखा है मुझे कभी?
अकेला तुम मुझे कभी ना पाओगे,
घिरा रहता हूं हमेशा मैं भीड़ से,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                           

काश..! मैं भी अपने बच्चों को दुपहिया पर घुमा पाता,
कांधों पे बिठा अपने तितलियों की तरफ़ दौड़ पाता,
चौपाटी के वो गोल-गप्पे मेरा भी मन ललचाते हैं,
बारिश के सुहाने मौसम मुझे भी गुदगुदाते हैं,
लेकिन कुचलकर मैं सारे अरमानों को,
घुटता रहता हूं अपनी विशिष्टता की कैद में।
                    
हे विधाता! तू मुझे  अगला जन्म मत देना,
और यदि दे तो यह विशिष्टता मत देना।
क्योंकि मैं भी जीना चाहता हूं अपनी ज़िंदगी,
एक आम आदमी की तरह...।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चारों धामों के चक्कर में

अपने धाम प्रसन्न सुखी थे, बारिश गर्मी ठण्ड में
चारों धामों के चक्कर में, मरे उत्तराखण्ड में।

महाप्रलय ने दी होगी जब दस्तक आकर द्वारे
ईश्वर शून्य लगे होंगे मंदिर,मस्ज़िद, गुरूद्वारे।
भूख-प्यास से, मृत्यु-त्रास से, जान गए तुम होंगे
कितनी निर्मम, कितनी अक्षम होती हैं सरकारें
अपने के कंधों पर जाते, चन्दन गंध चिता में पाते
जलने भर को मिली ना लकड़ी अनुकम्पा के फण्ड में॥

-डा.विनोद निगम


कार्टून


बुधवार, 18 सितंबर 2013

क्षमावाणी

आहत मन जो हुआ कभी हो,
दुखती रग को छुआ कभी हो।
पीड़ित हुई हो कोई भावना,
भूल गए हों प्रेम-साधना।
जाने-अनजाने सब कर्मों की,
आज तुमसे है क्षमा मांगना।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ग़ज़ल

फ़ज़ाओं से ये पयाम मिला है अभी
किस तरह मेरा गांव जला है अभी

कितने परिन्दे बेघर हो गए देखो
कोई दरख़्त जड़ों से हिला है अभी

इंसानियत कैसे ज़िंदा बच पाएगी
आदम शैतान से जा मिला है अभी

मुनासिब वक्त में हम भी बोलेंगे
जो सच होठों पे सिला है अभी

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 सितंबर 2013

क्यों हिन्दू-मुसलमान...

क्यों हिन्दू-मुसलमान हुआ जाए
लाज़िसी है अब इंसान हुआ जाए

बन सकते हैं जब दिलों का सुकूं
क्यों दर्द का सामान हुआ जाए

टकरा  रहीं  हैं आपस में सरहदें
चलों यारों आसमान हुआ जाए

आओ हकीकत की तस्दीक करें
कौन तीर;कौन कमान हुआ जाए

लहू से खेलना दरिन्दों का काम है
कभी आदम की पहचान हुआ जाए

मरासिमों की लाशें जलाए हरदम
मेरा ये दिल श्मशान हुआ जाए

खुदा के वास्ते चुप भी रहिए दानां
खूबसूरत शहर वीरान हुआ जाए

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 4 सितंबर 2013

धुंधला हुआ प्रकाश

 प्रकाश झा
आज "सत्याग्रह" देखी। अन्ना हजारे के आंदोलन को प्रत्यक्ष देखने के बाद उस जैसे आंदोलन का नाट्य रूपान्तरण बिल्कुल भी आकर्षक नहीं लगा। फिल्म की कहानी कमज़ोर है। "मल्टी स्टारर" करने के चक्कर में कुछ पात्र जबरन ठूंसे गए हैं जैसे करीना कपूर, अर्जुन रामपाल आदि। इस फिल्म ने पुराने ज़माने के बेहद मशहूर गीत "हमरी अटरिया पे आजा रे साँवरिया, देखा-देखी तनिक हुई जाए" की जिस तरह याद दिलाई उससे दुःख हुआ। सिर्फ एक गीत "रघुपति राघव राजा राम" को यदि छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं है। यदि आप इतने विशाल ह्रदय के मालिक हैं कि एक गीत के लिए पूरी फिल्म सहन कर सकते हैं तो बेशक आप यह फिल्म देख सकते हैं।
लगता है दामुल,मृत्युदण्ड,गंगाजल और अपहरण जैसी सार्थक फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा की चमक अब फीकी पड़ गई है। राजनीति,चक्रव्यूह,आरक्षण और इसी कड़ी में अब सत्याग्रह इसका जीवंत उदाहरण हैं।"राजनीति" को झा साहब जिससे प्रेरित बताते हैं उस थीम की लाजवाब फिल्में "हम पाँच" व "आँधी" पहले ही मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। उन फिल्मों के आगे "राजनीति" बेहद हल्की साबित हुई। फिर आई "आरक्षण" जिसमें अति संवेदनशील आरक्षण को फिल्म का विषय बनाया गया किंतु यहाँ भी प्रकाश झा मुद्दे से भटक कर महज़ शिक्षा की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को ही चित्रित कर सके। उसके बाद "चक्रव्यूह"में प्रकाश झा नक्सलवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे को आधार बनाने की कोशिश में "नमक हराम" की नकल कर बैठे। ये फिल्में या तो असफल रहीं या साधारण सफल। समीक्षकों ने इनमें से किसी भी फिल्म को नहीं सराहा। कुल मिलाकर इन दिनों प्रकाश झा अपनी फीकी पड़ी चमक के साथ मुद्दों व फिल्मों की नकल की खिचड़ी बनाकर प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं।

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

पानी सर ऊपर है

कछु करो अब नाथ,
पानी सर ऊपर है।
छूटे हाथ से हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

डूबी गाड़ी; डूबी गैल,
डूबा हमरा कबरा बैल।
कछु ना आयो हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

बह गए सारे ढ़ोना-टापर,
तितर-बितर भई है बाखर।
भए बच्छा-बच्छी अनाथ,
पानी सर ऊपर है॥

घनन-घनन-घन गरजे बदरा,
उमड़-घुमड़ के बरसे बदरा।
बिजुरिया चमके साथ,
पानी सर ऊपर है॥

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मानस में नारी

 भ्राता,पिता,पुत्र उरगारी।
पुरूष मनोहर निरखत नारी॥

ढोर,गंवार,शूद्र,पशु,नारि।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

काम,क्रोध,लोभ आदि मद, प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह मह अति दारुन दुखद मायारूपि नारि॥

नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं, अवगुन आठ सदा उर रहहीं।
साहस,अनरत,चपलता,माया, भय अविवेक,असौच, अदाया॥
(रामचरितमानस)

रविवार, 18 अगस्त 2013

सुभाषित

यद्यपि शुद्धं;लोक विरूद्धं,
नाकरणीयं; नाचरणीयं।
(किरातार्जुने)
यद्यपि जो शुद्ध हो किंतु लोकरीति के विरूद्ध हो,ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।

*****

हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरमं।
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्ष्यते॥
(बृहस्पति आगम)


*****

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये
पयपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनमं।


*****

न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥
(मनुस्मृति ५-५३)
अर्थ-मांसभक्षण,मद्यपान और मैथुन में दोष नहीं है। मनुष्यों में यह गुण प्रकृति प्रदत्त हैं, किन्तु इनसे निवृत्ति लेना अधिक श्रेष्ठ है।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षा-"फिर कुंडी खटकी है"


कुछ वर्ष पूर्व मुझे मेरे एक मित्र ने कवि प्रदीप दुबे "दीप" की "फिर कुंडी खटकी है" नामक पुस्तक पढ़ने को दी। मुझे इसकी रचनाएं बेहद पसंद आईं। अभी कुछ दिनों पहले प्रदीप जी ने यह पुस्तक मुझे भेंट कर इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा। मैंने इसकी रचनाओं को जब पुनः पढ़ना प्रारंभ किया तो पुराने भाव फिर से नवीन महसूस होने लगे। प्रदीप जी रचनाएं आम आदमी की बात करतीं हैं। इन रचनाओं के विषय भी आम आदमियों के अपने हैं। प्रदीप जी अपनी रचनाओं में कठोर धरातल का चित्रण करते हैं ना कि किसी स्वप्नलोक का, एक बानगी देखिए-
फिर कुंडी खटकी है शुभदे
देख नया दुख आया होगा।
खुद चलकर आया होगा या
अपनों ने पहुंचाया होगा॥

प्रेम और विरह का चित्रण करने का भी प्रदीप जी का अपना ख़ास अंदाज़ है अपनी एक रचना में विरहा को कुछ इस अंदाज़ में चित्रित करते हुए वे कहते हैं-
बहुत उदास रहा
घर तुम बिन
चीज़ें बिखरी मन बिखरा था
मौसम का चेहरा उतरा था
सुधियों का जमघट था फिर भी
निपट अकेलापन पसरा था

इसी मिज़ाज़ की एक और रचना देखिए-
खुद टूटे पर कभी न तोड़ी
प्रीत; प्रीत की रीत,
सच-सच कहना बालू भैया
हार हुई या जीत?

अपनी एक और सशक्त रचना में प्रदीप जी ग्रामीण परिवेश का चित्रण करते हुए कहते हैं-
क्या बतलाएं बंसी भैया
इन दिन क्या चल रहा गांव में,
और नये छाले उभरे हैं
पगडंडी के लटे पांव में।

मुझे जो बात प्रदीप जी की रचनाओं में सबसे अच्छी व भली लगती है वह है उनकी सरलता। वे बिना किसी भारी-भरकम शब्दों की जमावट किए बगैर बिल्कुल सीधी-सादी बोली में अपनी व गहरी बात संयुक्त रूप से कहने में सफल हुए हैं। लेकिन इस दृष्टि से उनकी रचनाओं में कोई हल्कापन आया हो ऐसा नहीं है वे अपनी रचनाओं में गहरी से गहरी बात व विषयों को बड़े ही सरल और सहज संप्रेषण के माध्यम से उठाने में कुशल हैं। ये पंक्तियां देखिए-
इस बस्ती में क्षेम-कुशल है, कैसे कह दूं?
आते दिखा रुपहला कल है, कैसे कह दूं?

बैठ ना पाखी ह्रदय हार के
लौटेंगे दिन हरसिंगार के

दीपक तुम बेकार आ गए
सूरज वालों की बस्ती में

वर्तमान जनजीवन का दर्द प्रदीप जी ने अपनी इस रचना में बखूबी उकेरा है-
निपट अकेले बंटे हुए हम
आधे घर आधे दफ़्तर में
कभी लदा घर दफ़्तर पहुंचा
कभी लाए दफ़्तर को घर में।

प्रदीप जी ने दोहों पर भी अधिकार पूर्वक अपनी लेखनी चलाई है। मुझे उनके दोहों में जो अधिकांश प्रीतिकर लगता है वह है-
कहां प्रीत की माधुरी कहां नेह की गंध
मुंह देखे की बतकही सुविधा के संबंध।

कुल मिलाकर किसी कवि की श्रेष्ठता का अनुमान इस बात से नहीं होता कि उनकी कृतियों को कितने प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मान मिलें हैं या उस कृति को कितने नामचीन लोगों ने अपने हाथों में लेकर तस्वीर खिंचाई है बल्कि इस बात से होता है कि पाठक उसकी रचनाओं को कितना अपना समझते हैं। मेरे देखे किसी रचना की सार्थकता तभी होती है जब उसे पढ़ने वालों को लगे कि "अरे यह तो अपनी ही बात कह दी गई।" वैसे भी वर्तमान युग प्रमोशन व ब्रांडिंग का है। कई कवि अपनी पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाते किंतु पाठकों की पसंद की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते वहीं प्रदीप जी जैसे कवि बिल्कुल सहज होते हुए भी अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम पाठकों के ह्रदय में स्थान प्राप्त करने में सफल हो जाते है। आप सभी से अनुरोध है एक बार "फिर कुंडी खटकी है" पढिएगा ज़रूर।
प्रदीप जी इसी प्रकार खूब लिखें और उन्हें यथोचित सम्मान प्राप्त हो मां शारदे से यही प्रार्थना है...!

समीक्षक-हेमन्त रिछारिया 

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

स्तरहीन बौद्धिक


कल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यक्रम "अखण्ड भारत संकल्प दिवस" में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक बड़े पदाधिकारी का बौद्धिक (भाषण) हुआ। उनका बौद्धिक वस्तुतः संघ के संस्थापक डा.हेडगेवार व संघ को संवर्धित करने वाले श्रीयुत गुरूजी एवं संघ की मूल विचारधारा के प्रतिकूल था। उनका  बौद्धिक स्तरहीन व नकारात्मक प्रभावोत्पादक था। यही वजह है कि आज आम जन संघ से संबद्ध होने में स्वंय को असहज पाता है। इसी प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों की वजह से आज संघ की छवि धूमिल ना सही पर उज्जवल नहीं रही; जो कभी हुआ करती थी। आज इस प्रकार के पदाधिकारी व स्वंयसेवक एक वर्ग विशेष की आलोचना करना ही संघ की मूल विचारधारा मानते हैं जबकि संघ की मूल विचारधारा राष्ट्रनिष्ठा, सांस्कृतिक गौरव, धर्मनिष्ठा व हिंदू समाज को संगठित करना है। इस विचारधारा को संपुष्ट करने में यदि राष्ट्रविरोधी तत्वों की सहज निंदा करना पडे़ तो कोई हानि नहीं। ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्व आज हर दल में, हर वर्ग में उपस्थित हैं। ऐसे में वक्ता को अपनी बुद्धिमत्ता से मूल विचारधारा के अनुरूप अपना वक्तव्य देना चाहिए। अच्छा होता यदि ये महाशय अखंड भारत की खंडता व राष्ट्रनिष्ठा पर अपना बौद्धिक केंद्रित करते तो वही होता जिसे हम कहते हैं कि "सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती"। मेरा देशवासियों से यही निवेदन है कि वे इस प्रकार के तथाकथित स्वंयसेवकों व पदाधिकारियों के बौद्धिकों से संघ के बारे में कोई धारणा ना बनाएं। संघ की मूल विचारधारा को समझने के लिए वे "डा.हेडगेवार चरित्र" व "गुरूजी समग्र" जैसी प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। मेरा विश्वास है कि वे इन ग्रंथों के अध्ययन के उपरांत संघ की विचारधारा से सहमत हुए बिना नहीं रह सकेंगे।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

यार, हम कहां आ गए

अखण्ड भारतवर्ष
बीते ६६ साल यार,
हम कहां आ गए।

होती बड़ी निराशा है,
ना ही कोई दिलासा है।
कैसे बचाएं वतन अपना
सियासी दीमक खा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

गहन तिमिर का घेरा है,
घोर निशा का डेरा है।
कैसे फैलेगी अरूणिमा
काले मेघ जो छा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

पतनोन्मुख हुई व्यवस्था है,
हालत हो रही खस्ता है।
लक्ष्य विकास के सारे
आंकड़ों ही से पा गए॥
बीते ६६ साल यार, हम कहां आ गए।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 10 अगस्त 2013

"धर्म दण्डयोऽसि"

प्राचीनकाल में किसी राजा को चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करना आवश्यक होता था। यज्ञ संपन्न करने के पश्चात पूर्णाहुति के समय राजा तीन बार उच्चार करता था-"अदण्डोऽस्मि....अदण्डोऽस्मि...अदण्डोऽस्मि..!"
अर्थात अब मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता, राजा के प्रत्येक उच्चार के बाद राजपुरोहित अपने धर्मदण्ड को राजा के मस्तक से स्पर्श कराकर उच्चार करता था-"धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...!" जिसका अभिप्राय होता है-धर्म तुम्हें दण्ड दे सकता है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सहर

होने लगी है अब सहर देखिए
कहां तक होता है असर देखिए

पांवो के छाले क्यूं देखते हैं आप
जानिबे-मंज़िल मेरा सफ़र देखिए

जाने कितने अपनी जां से गए
दोशीजा शबाब का कहर देखिए

भीड़ ही भीड़ नज़र आती है हर सूं
तन्हा-तन्हा सा हर बशर देखिए

नूरे-खुदा नज़र आएगा तुम्हें
बच्चों की मासूम नज़र देखिए

किसकी नज़र लगी है इसे
सुलगता मेरा शहर देखिए

दैरो-हरम में महदूद रहेगा?
वो है नुमाया जिधर देखिए

-हेमन्त रिछारिया


अर्ज़ किया है-

"छत पे आजा कि तेरी दीद हो जाए
 हम दीवानों की भी ईद हो जाए"

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा किए गए हमले में हमारे ५ जवान शहीद हो गए। इस तरह की खबरें मीडिया के लिए मानो संजीवनी का काम करतीं हैं। सारे राष्ट्रीय चैनल व पत्रकार इसका प्रभाव समझने के लिए निकल पड़े। होना भी यही चाहिए, देश की जनता को देश की सुरक्षा संबंधी घटनाओं से परिचित कराना हमारे इस चौथे स्तंभ का ही कार्य है। परन्तु जिस प्रकार की रिपोर्टिंग हमारे अधिकांश खबरनवीस कर रहे हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि इस प्रकार की सामरिक,संवेदनशील व राष्ट्रीय महत्व की घटनाओं को "कवर" करने की योग्यता का हमारे अधिकतर पत्रकारों व न्यूज़ चैनलों में अभाव है। कुछ पत्रकार बंधु शहीद हुए सैनिकों के गांव पहुंचकर उनके घर के हालात देशवासियों को दिखाकर इसलिए अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे क्योंकि वे वहां सबसे पहले पहुंचे हैं। घर में रोती-बिलखती;बेसुध पड़ी महिलाओं का चित्रण करना उन्हें शायद अपनी खबर में वज़न का अहसास कराता होगा। इतना नहीं कुछ पत्रकार शहीद हुए जवान के माता-पिता के गमगीन चेहरों के आगे माइक लगाकर "बाइट" लेने की कोशिश करते हुए पूछते हैं कि "आप कैसा महसूस कर रहे हैं?" महदआश्चर्य है! भला एक पिता जिसका जिसका पुत्र शहीद हो गया हो; एक पत्नी जिसका सुहाग उजड़ गया हो, कैसा महसूस करेगें? एक मीडिया समूह ने एसएमएम के जरिए सर्वे शुरू कर दिया कि क्या पाकिस्तान पर कार्रवाई की जानी चाहिए? जवाब में तकरीबन १ लाख लोगों के एसएमएस पहुचं गए कि "हां" कार्रवाई की जानी चाहिए। ये बात अलग है कि यदि इस बात का सर्वे किया जाए कि इन १ लाख लोगों में से कितनों के परिजन भारतीय सेना में हैं या आवश्यकता होने पर सेना में जा सकते हैं तो परिणाम अत्यंत निराशाजनक आएंगे। इस प्रकार की पत्रकारिता से आप क्या साबित करना चाहते हैं? मेरा यही निवेदन है इस प्रकार की घटनाओं को इस प्रकार "कवर" किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी कुछ प्रेरणा ले सके व उसे देश के प्रति अपने कर्तव्य का बोध हो, ना कि इस देश की जनता दिखाई गई खबरों को नाटक का अंश समझकर मनोरंजन मात्र करे।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

हम दागी हैं तो क्या हुआ....

 अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सजायाफ़्ता व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। यह पाबंदी जेल के अंदर से चुनाव लड़ने पर जारी रहेगी। इस फैसले का जहां देशवासियों ने दिल से स्वागत किया वहीं इसने राजनीतिक दलों व राजनेताओं की नींद उड़ा दी। खबर है कि जल्द ही सरकार इस फैसले के खिलाफ संसद में बिल पारित करने जा रही है। संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ की माने तो सभी दल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के विरूद्ध कानून में संशोधन करने के लिए एकजुट हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि गत वर्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध जब लोकपाल कानून के लिए आंदोलन हुआ था तो यही दल एक-दूसरे टांग खींचते नज़र आए थे। आज जब भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया जा रहा तो यही दल अपना अंतर्विरोध भूलकर गलबहियां डाले एक साथ खड़े हैं। क्योंकि ये इनकी कुत्सित राजनीति का सवाल है;स्वार्थ का सवाल है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये राजनीतिक दल व राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं इसके उदाहरण हमने समय-समय पर देखे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए और ना ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को भूलने देना चाहिए कि यह आज़ादी हमें बिना खड्ग-बिना ढाल के प्राप्त नहीं हुई है इसके लिए हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इस आजादी को पाने के लिए जाने कितनी माताओं ने अपनी युवा संतानों को हंसते-हंसते देश पर न्यौछावर कर दिया है। कितनी बहनों ने अपना सुहाग खोया है। कितने युवक भर यौवन में काल के गाल में समा गए और आज भी जब देश पर संकट आता है तो ऐसा ही नज़र देखने को मिलता है। भला कारगिल को कौन भूल सकता है? इसलिए इस देश के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य है। जब ये दुष्चरित्र नेता अपने स्वार्थ के लिए देश को हानि पहुंचाने वाले कार्यों के लिए अपने अंतर्विरोध भूलकर एकजुट हो सकते हैं तो क्या हम देशवासी अपने देश के रक्षण के लिए अंतर्विरोध त्यागकर एक नहीं हो सकते। आज लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में अपराधियों व दागीयों की बहुतायत है। सभी दल अपनी सीटें बढ़ाने के उद्देश्य से दागी व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव मैदान में उतारते हैं और फिर इन्हीं के दम पर समर्थन देते समय सौदेबाजी करते हैं। आखिर अयोग्य व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को देश की नीति निर्धारण का कार्य कैसे सौंपा जा सकता है? इन राजनेताओं का यह कहना है कि संसद की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं परन्तु ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि संसद से बढ़कर भी जन-संसद होती है जो देर-सबेर उनकी इस बुरी नीयत को समझ ही जाएगी। आज देशवासियों को यह संकल्प करना चाहिए कि भले ही संसद सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अपनी निम्नस्तरीय चालबाजियों के चलते अमान्य कर दे परन्तु हम उसका अक्षरशः पालन करते हुए आपराधिक व दागी छवि वाले अयोग्य व्यक्तियों को संसद में नहीं भेजेंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र एवं राष्ट्र-रक्षण की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम होगा।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

मां सुनाओ मुझे वो कहानी...



मां सुनाओ मुझे वो कहानी
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी
जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें ना हो अप्सरा की
हो ना परियां जहां आसमानी

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रोशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी

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शायर-नन्दलाल पाठक
स्वर-सिज़ा राय
संगीत-जगजीत सिंह

सोमवार, 29 जुलाई 2013

आंख तो फूटी,अंजन काहे

कल श्री एन.रघुरामन जी के कार्यक्रम में एक अजीब किस्सा सामने आया। संस्क्रत विशारद महर्षि पाणिनी के नाम पर प्रारंभ किए गए विद्यालय के एक अध्यापक ने प्रश्नोत्तर कार्यक्रम के दौरान हिचकोलेदार अंग्रेजी में रघुरामन जी से एक प्रश्न किया। प्रश्न कितना सार्थक था ये एक अलग विषय है परन्तु उन महोदय ने वहां उपस्थित जनसमुदाय का;जो कि पूर्णरूपेण हिन्दीभाषी था,उसके समक्ष अंग्रेजी बोलकर जो अपमान किया उसे मैं सहन नहीं कर सका और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा ताकि उन्हें इस मिथ्या अहम का बोध कराने वाली परम्परा का मर्म समझा सकूं,किंतु अवसर नहीं मिला। महदआश्चर्य की बात है कि वहां मुख्यवक्ता श्री रघुरामन जो कि मूलतः मद्रासी और अहिन्दी भाषी हैं वे स्तरीय हिन्दी बोल रहे थे और उन्होंने अपना संपूर्ण व्याख्यान भी सुस्पष्ट हिंदी में दिया,वहीं हमारे ये सज्जन उनसे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। विशेष  बात तो यह कि रघुरामनजी ने इनके अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी हिन्दी में दिया। आखिर इस प्रकार अंग्रेजी भाषा का दिखावा करके हम क्या साबित करना चाहते हैं? यही कि हमें अपनी भाषा का गौरव नहीं है या हम भाषाई रूप से इतने दरिद्र हैं कि हमें वार्तालाप करने के लिए भी किसी पराई भाषा का अवलंबन लेना पड़ता है या फिर हमने अंग्रेजी को भद्र और विद्वान होने का स्थाई मानक मान रखा है जिसका प्रयोग करने वाला अन्य लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा? निश्चित ही हर भाषा का अपना महत्व है; इस रूप में अंग्रेजी भी महत्वपूर्ण है किंतु वहां जहां इसकी महती आवश्यकता हो। मेरे देखे अंग्रेजी संपर्क की भाषा तो हो किंतु दिखावे या फैशन का मानक ना बने परन्तु आज हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यहां अंग्रेजी एक फैशन व भद्रता-मानक (स्टेट्स सिंबल) बनती जा रही है। मुझे यहां पूज्य संत श्री मोरारी बापू की एक बात स्मरण आ रही है उन्होंने एक बार कहा था "आंख तो फूटी, अंजन काहे" अर्थात जब आंख ही नहीं होगी तो अंजन का क्या करोगे। हिन्दी हमारा नेत्र है और अन्य समस्त भाषाएं उस नेत्र पर अल्प समय आंजने वाला अंजन। ये कहते हुए बड़ी लज्जा का अनुभव होता है कि आज हमारे अधिकांश युवा हिन्दी का सुस्पष्ट उच्चारण करने व लिखने में असमर्थ हैं और उन्हें इस बात की कोई पीड़ा नहीं क्योंकि वे अंग्रेजी भली-भांति जानते हैं। मेरा मेरे देशवासियों से इतना ही निवेदन है कि हमारे ह्रदय में सम्मान तो हर भाषा का;हर परम्परा का;हर धर्म का हो किंतु गौरव "निज" का हो;अपने का हो।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 जुलाई 2013

परमवीर चक्र विजेता

परमवीर चक्र विजेता
(1947-1999)

 

 (जम्मू काश्मीर में कार्रवाई)

1947-48 J & K Operations


मेजर सोमनाथ शर्मा (मरणोपरांत)
Major Somnath Sharma, 4 kumaon, (Posthumous)

राम राघोबा राने
2nd  Lt. Ram Raghoba rane,crops of engineers

पीरु सिंह (मरणोपरांत)
CHM Piru Singh,6 Rajputana Rifles, (Posthumous)

नायक जदुनाथ सिंह  (मरणोपरांत)
Naik Jadunath Singh, 1 Rajput, (Posthumous)

लांस नायक करम सिंह
Lance Naik Karam Singh, 1 Sikh

1962 indo-china war

(भारत-चीन युद्ध)


मेजर शैतान सिंह  (मरणोपरांत)
Major Shaitan Singh, 13 Kumaon, (Posthumous)

मेजर धनसिंह थापा
Major Dhan Singh Thapa,1/8 Gorkha Rifles

सूबेदार जोगिन्दर सिंह  (मरणोपरांत)
Subedar Joginder Singh,1 Sikh, (Posthumous)

1965 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


ए.बी.तारापोरे (मरणोपरांत)
Lt. Col. A.B.Tarapore, 17 poona horse, (Posthumous)

अब्दुल हामिद (मरणोपरांत)
CQMH Abdul Hamid,4 Grenadiers, (Posthumous)

1971 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


मेजर होशियार सिंह
Major Hoshiar Singh,3 Grenadiers

अरूण खेत्रपाल  (मरणोपरांत)
2nd Lt. Arun Khetarpal, 17 poona Horse, (Posthuomus)

फ्लाइंग आफीसर निर्मलजीत सिंग सेखों  (मरणोपरांत)
Fg. Off. Nirmal Jit Singh Sekhon, no.18 squadron, (Posthumous)

लांस नायक अल्बर्ट एक्का  (मरणोपरांत)
Lance Naik Albert Ekka,17 Gards, (Posthumous)

1999 Kargil operations
(कारगिल में कार्रवाई)


कैप्टन विक्रम बत्रा  (मरणोपरांत)
captain Vikram Batra,13 JAK Rifles, (Posthumous)

लेफ्टिनेंट मनोज के पांडे  (मरणोपरांत)
Lt. Manoj k. Pandey, 1/11 GR, (Posthumous)

ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
Grenadier Yogendra Sing Yadav,18 Grenadiers

राइफलमेन संजय कुमार
Rifleman Sanjay Kumar,13 JAK Rifles

UN Operations


कैप्टन जी.एस.सलारिया  (मरणोपरांत)
Captain G.S. Salaria, 3/1 GR. (Posthumous)

Saichen Operations


नायब सूबेदार बानासिंह
Naib Subedar Bana Singh, 8 JAK,LI

 

 IPFK Operations


मेजर आर.परमेस्वरन  (मरणोपरांत)
Major R. Parameswaran,8 Mahar, (Posthumous)


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निवेदन- उपरोक्त जानकारी हमने विभिन्न समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रानिक मीडिया, इस विषय पर प्रसारित कार्यक्रमों व इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त की है। इसकी प्रामाणिकता के संदर्भ में हमारा कोई आग्रह नहीं है। यद्यपि इसके स्रोत के संबंध में हमने पूर्ण सावधानी बरती है। अतः सुधि पाठकगण इसे पढ़ते व प्रयोग करते समय अपने स्वविवेक से काम लें।
-संपादक

शनिवार, 27 जुलाई 2013

ऐसा प्यार कहां...

तानसेन
किसी संत ने कहा है कि "जे तेरे घट प्रेम है, ते कहि-कहि ना सुनाव। अंर्तजानी जानिए, अंर्ततम का भाव॥" ठीक भी है दो व्यक्तियों का प्रेम बिल्कुल निजी घटना है और उसके प्राकट्य के तरीके भी उतने ही निजी होते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग सुप्रसिद्ध गायक तानसेन के जीवन में आता है जब अकबर रीवा नरेश राजा रामचंद्र को तानसेन को दिल्ली भेजने का आदेश देते हैं तो इससे रीवा नरेश अत्यंत दुखी हो जाते हैं पर विवश हो उन्हें तानसेन को दिल्ली भेजना ही पड़ता है। रास्ते में जब तानसेन पानी पीने के लिए एक कुंए पर रुकते हैं तो देखते हैं कि जिस चौडोल में वो बैठे थे उसे कहारों के साथ खुद रीवा नरेश ने अपने कांधों पे उठा रखा है। ये देखकर तानसेन अत्यंत भाव-विभोर हो जाते हैं और वे राजा रामचंद्र से कहते हैं कि "यद्यपि मैं आपको कुछ दे नहीं सकता पर आज एक वचन देता हूं कि जिस दाहिने हाथ से आज तक आपको "जुहार" (सलाम,नमस्कार) की है उस दाहिने हाथ से आज के बाद किसी और को जुहार नहीं करूंगा।"कहते हैं कि इसके बाद तानसेन हमेशा बाएं हाथ से सलाम करते थे।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

ऐसी वाणी बोलिए...

"ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय॥" शायद एक संत की यह सीख आज के दौर के राजनेता भूल गए हैं। दिग्विजय सिंह,बेनीप्रसाद वर्मा,नरेंद्र मोदी,राज ठाकरे,मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, ममता बनर्जी ये वे नाम है जो अपनी फिसलती जिव्हा के कारण आए दिन सुर्खियों व विवादों में रहते हैं। क्या हमारे शब्दकोश का दारिद्रय इतना बढ़ गया है कि हमें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अच्छे;सार्थक व मर्यादित शब्दों का मिलना असंभव प्रतीत होने लगा है जिसके कारण हमें निम्न स्तरीय;ओछे व अमर्यादित शब्दों की शरण लेनी पड़ रही है या फिर इन राजनेताओं की बुद्धि के स्तर में तेजी से पतन हुआ है क्योंकि यह कह देना कि मेरे बयान का गलत अर्थ निकाला गया है या उसे तोड़-मरोड़ के पेश किया गया है, महज़ एक वंचना मात्र है। शब्दों का जादूगर तो वह व्यक्ति होता है कि विरोधी चाहकर भी उसकी बात के अर्थ को अनर्थ ना कर सकें। हमने ऐसे शब्दों के जादूगरों को अपने ही देश में देखा है उन्हीं में से एक नाम है पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी। हमारे मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है। शालीनता से; मर्यादित व कर्णप्रिय बोलना एक प्रकार से ब्रह्म की उपासना करना है वहीं असभ्यतापूर्ण;अमर्यादित व दूसरे को क्षोभ पहुंचाने वाला संभाषण उस ब्रह्म का निरादर है। शब्दों की एक खास ढंग से की गई जमावट ही तो मंत्र या वरदान कहलाती है और जब ये नहीं होती तो श्राप या गाली-गलौज बन जाती है। जो व्यक्ति इस सूक्ष्म विभेद को नहीं समझता उसे बोलने का कोई अधिकार नहीं है, कम से कम वक्ता होने का तो बिल्कुल भी नहीं। आज के दौर के ये सारे राजनेता भली भांति जानते हैं कि जो मीडिया इनकी छींक तक को राष्ट्रीय फलक पर लाकर सुर्खियां बटोर लेता है वो इनके बेतुके बयानों को क्या यूं ही नज़रअंदाज़ कर देगा; नहीं कदापि नहीं, फिर भी ये अपने निम्न स्तरीय व संकीर्ण मानसिकता वाले बयानों से खबरों में बने रहना चाहते हैं क्योंकि इन्हें सुना जाता है। जिस दिन इस देश की जनता अमर्यादित बयानबाजी करने वाले नेताओं को सुनना बंद कर देगी और मीडिया उन्हें उछालना रोक देगा उसी दिन से ये अमर्यादित वक्ता अपनी वाणी पर अंकुश लगाना प्रारंभ कर देंगें। आखिर किसी बेतुके बयान को बार-बार प्रसारित करने का क्या औचित्य? क्यों उसे इतना महत्व दिया जाता है। यदि एक बार किसी नेता ने मर्यादा लांघी तो उसका संपूर्ण बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता। क्यों उसकी एक "बाइट" के लिए पुनः मीडया लालायित रहता है? सच तो यह है कि मीडिया भी ऐसे मसालेदार बयानों की खोज में रहता है जिससे खबर ज़्यादा उत्तेजक बने परन्तु इन सबके कारण जो सामाजिक व सांस्क्रतिक नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा। इस प्रकार गलत वस्तुओं को प्रवाह में डालने से अंततोगत्वा राष्ट्र व समाज की हानि ही होती है। होना तो यह चाहिए कि श्रेष्ठ को प्रवाहमान किया जाए और निक्रष्ट को रोका जाय जिससे देश की राजनीति में एक गलत परम्परा की शुरूआत होने से बचा जा सके।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

राष्ट्रीय अपमान

हाल ही में खबर आई थी कि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने अमरीका प्रवास के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा से मोदी के वीज़ा को लेकर चर्चा करने वाले हैं। इसकी खबर लगते ही लोकसभा के ४० और राज्यसभा के २५ भारतीय सांसदों ने ओबामा को फैक्स कर मोदी को वीज़ा ना दिए जाने की अपील की है। मोदी के वीज़ा का विरोध करने में इतनी जल्दी तो वहां के सीनेटरों ने भी नहीं की जितनी जल्दबाजी में ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांसद दिख रहे हैं। यहां एक बात और विचारणीय है कि मोदी को अमरीका का वीज़ा मिलने से इन पर कौन सी आफत आ जाती, क्या ये अमरीका के हक में अपनी वफ़ादारी सिद्ध करना चाहते हैं या वहां की सीनेट का सदस्य बनना चाहते हैं। परन्तु मैं इन सांसदों व इनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी की मजबूरी समझ सकता हूं आखिर ये दल ज़िंदा ही हैं तुष्टिकरण की राजनीति पर। इन सांसदों के इस कदम  से विश्व में भारत की साख को क्षति पहुंची है, देश का अपमान हुआ है। दलगत राजनीति करना कोई बुरी बात नहीं और ना ही राजनीतिक मतभेद या विरोध करने में कुछ हानि है परन्तु अपने घर का झगड़ा किसी तीसरे को दिखाना ये अपने घर के साथ गद्दारी है। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की फ़िक्र करते हैं यदि किसी दिन इस देश में बहुसंख्यक एकजुट होकर वोट करने लगेगें तो फ़िर देखिए ये किस तरह अपने सुर व नीतियां बदलते हैं। हमारे देशवासियों को चाहिए कि इनकी सियासी चालों को समझें व इन्हें अपनी ओछी राजनीतिक बिसात बिछाने के लिए अवसर ना दें जिससे देश की अखंडता अक्षुण्ण रह सके।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

अर्ज़ किया है.....

अब नहीं अटकता दिल दुपट्टे में
उम्र का अपना तकाज़ा होता है

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कहां तो मुश्किल था लम्हा तेरे बगैर
कहां गुज़ार दी देख ज़िंदगी हमने

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ज़ायका बिगाड़ गया सब्र का फल
हमने तो सुना था मीठा होता है

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अपने बदरंग लिबासों की फिक्र कौन करे
बे-पर्दा रूह का जब एहतराम हो निगाहों में

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वादों का टूटना तो सुना था अक्सर शेख
आजकल कोशिशें भी कामयाब नहीं होतीं

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ए पारस सा मिज़ाज़ रखने वाले
मैं संग सही छूकर मुझे नवाज़ दे

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 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

हरम-ऐशगाह
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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

दाना-बुद्धिमान
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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
जुस्तजू-इच्छा;अभिलाषा

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस नस्ल का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

जज़्ब-समाना
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ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है

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जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते

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हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं

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खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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आसान मश्गला ना समझो अशआरों को गढ़ लेना
सौ बार तराशे जाते हैं ये दिल में उतरने से पहले


मश्गला-कार्य
अशआर-काव्य पंक्तियां

-हेमन्त रिछारिया
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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

अन्ना हजारे जी को "सरल-चेतना" भेंट

समाजसेवी पद्मश्री अन्ना हजारे जी को "सरल-चेतना" पत्रिका की प्रति भेंट करते  हुए संपादक हेमन्त रिछारिया

जनतंत्र यात्रा

भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी अन्ना हजारे की जनतंत्र यात्रा मध्यप्रदेश में प्रवेश कर चुकी है। उनकी आमसभाओं में भीड़ दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। शायद अब आम-आदमी को जन-लोकपाल का सही मतलब समझ आने लगा है। भ्रष्टाचार का अर्थ सिर्फ आर्थिक अनियमितताएं या रिश्वत का लेन-देन नहीं होता। भ्रष्टाचार के मायने व्यापक है। भ्रष्टाचार की सटीक परिभाषा यदि करूं तो वह है भ्रष्ट-आचरण। अपने कर्तव्य स्थल पर समय पर उपस्थित ना होना, लाइन तोड़कर बिल जमा करना या मंदिर में दर्शन करना, शहर और नदियों को प्रदूषित करना, आयकर बचाने के लिए आय छिपाना, मिलावट करना, मिथ्या संभाषण करना, अपने देश के गौरव और उसकी संस्क्रति को भूलना, सरकारी संपत्तियों का दुरूपयोग करना, भू-संपदाओं का दोहन करना,आदि-आदि सब भ्रष्टाचार का ही रूप है। जब हम भ्रष्टाचार के इन रूपों के बारे में विचार करते हैं तो पाते हैं कि हम सब कहीं ना कहीं इसमें शामिल हैं। हमारे देश में जितने कानून हैं यदि सब के सब कड़ाई से पालन कराए जाएं तो आम आदमी का जीना दूभर हो जाएगा। बानगी के लिए मकान बनाने के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेते समय जो नियमों की सूची दी जाती है उसमें एक नियम यह भी है कि भूमिस्वामी अपने मकान के चारों ओर ५-५ फीट की जगह नाली,पेड़ इत्यादि के लिए छोड़ेगा। अब ज़रा अपने आसपास नज़र दौड़ाईए और अपने स्वयं के भवन को देखिए कि कहां तक इस नियम का पालन किया गया है। यदि जन-लोकपाल आ जाता है तो भले ही कोई आपसे रिश्वत की मांग ना करे परन्तु नियमों के पालन करने में आम आदमी का पसीना छूट जाएगा। मेरे देखे भ्रष्टाचार से मुक्ति का एक सूत्र है: सुव्यवस्था+नैतिक उत्थान=भ्रष्टाचार मुक्त सामाजिक व्यवस्था। भ्रष्टाचार वह ताली है जो एक हाथ से नहीं बजती। यदि आज भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कहा जाने लगा है तो इसे निभाने वाले कौन हैं, हम ही हैं। क्योंकि हमें आज सब कुछ "इंस्टेंट";त्वरित चाहिए। हमारे पास समय व धैर्य कहां है? हम चाहते हैं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था हमें मिले पर इसके लिए कुर्बानी कोई अन्ना, कोई केजरीवाल दे, यह कहां तक उचित है। हमें भी अपने स्तर पर कोई ना कोई शुरूआत तो करनी होगी सिर्फ अन्ना की सभाओं में जाकर "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं" कह देने मात्र से तो आप अन्ना के साथ नहीं हो जाते। अन्ना के साथ होने का मतलब है उनके सिद्धांतो के अनुरूप जीवनचर्या का अनुपालन, जो आसान बात नहीं है। जब इस मुद्दे पर बात आती है तो यही तथाकथित आम आदमी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि "हम तो पेट की लड़ाई लड़ रहे हैं"। दरअसल हम अपने स्तर पर कोई शुरूआत करना ही नहीं चाहते। सब कुछ पका-पकाया चाहते हैं। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जो आवश्यकता से अधिक धन संचय करता है वह चोर है, कितना सीधा सूत्र है। अब ज़रा पूरी निर्दोषता से अपने आप से पूछिए क्या मैंने आवश्यकता से अधिक धन एकत्रित किया है? मेरा दावा है ९० फीसदी आम आदमियों का जवाब "हां" में आएगा। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, लोकशाही, ईमानदारी, ये सब कहने-सुनने जितने अच्छे लगते हैं जीने में उतनी कठिन परीक्षा लेते हैं। इसका यह आशय कतई नहीं कि ये कोशिश नहीं होनी चाहिए;निश्चित होनी चाहिए मगर अन्ना की तरह। अन्ना ने पहले खुद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया फिर इन कुव्यवस्थाओं के विरूद्ध शंखनाद किया। हमारा आज का आम आदमी शंखनाद पहले कर रहा है और आचरण में इससे कोसों दूर हैं। मेरे देखे आम आदमी होना कोई सरल बात नहीं है यह बेहद असाधारण चीज़ है।
"It is so simple conman man change whole corrupt system but is so difficult to be a conman man."
-हेमन्त रिछारिया

पुनश्च: कल रात एक न्यूज़ चैनल ने एक खबर प्रसारित की जिसमें यूपी के एक पूर्व विधायक श्री भगवती प्रसादजी का अत्यंत निर्धनता के चलते इलाज ना मिल पाने के कारण निधन हो गया। वे दो बार विधायक रह चुके थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना कार्यकाल व जीवन जिया। बाद में वे एक चाय की दुकान चलाकर अपना जीवकोपार्जन करते रहे। हाल ही में उन्होंने सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया कारण था इलाज के लिए पर्याप्त पैसों का अभाव। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजली।

बुधवार, 10 जुलाई 2013

"काम(सेक्स) ज़हरीला होकर ज़िंदा है"

प्रसिद्ध विचारक फ्रायड ने कहा था कि "हिंदुस्तान ने काम को ज़हर देकर मारने कोशिश की है मगर काम ज़हरीला होकर ज़िंदा है।" फ्रायड ने ठीक ही कहा था । आज जब-जब भी कोई कामुक विकृति से जुड़ी ख़बर आती है तो मुझे ओशो याद आ जाते है। वे अकेले ऐसे संबुद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने इस ज्वलंत मुद्दे पर कुछ कहने का साहस जुटाया था। मगर अफ़सोस इस देश व दुनिया के अधिकतर लोगों ने उन्हें नहीं समझा जिसका दुष्परिणाम आज हम सब भुगत रहे हैं। ओशो हमेशा कहते थे कि काम का दमन नहीं वरन अतिक्रमण करो, जागरण करो। उनके अनुसार होशपूर्वक किया काम ही काम से मुक्ति है। आज हमारे चारों दमन सिखाया जा रहा है जिसके फलस्वरूप उर्जा विकृत होकर अत्यंत घृणित रूप से बाहर आ रही है। केवल मनुष्य ही है जो २४ घंटे कामुक रह सकता है क्योंकि पशु-पक्षियों की तो ऋतु होती है जिसमें वे कामुक होते हैं। उर्जा तो एक ही है उसे "काम" कहें या "राम"। राम से यहां तात्पर्य उर्जा के उर्द्धगमन से है। उर्जा का नियम है यदि वो ऊपर नहीं जाएगी तो नीचे जान शुरू कर देगी जो कि सहज मार्ग है। चढ़ने में हमेशा कठिनाई होती है गिरना हमेशा से सरल रहा है। जब तक हम इस उर्जा को रूपांतरित कर उर्द्धगमन में संलग्न नहीं कर देते तब तक इस प्रकार की यौन दुर्बलताओं से निजात नहीं पा सकते। दमन तो सिर्फ और सिर्फ उर्जा को विकृत ही करता है इसलिए दमन नहीं वरन जागरण।

मंगलवार, 18 जून 2013

पत्रकारों से चर्चा

                    गंगा दशहरे के पावन पर्व पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

रविवार, 16 जून 2013

राष्ट्रवाद बनाम छ्द्म धर्मनिरपेक्षता

आख़िरकार जदयू-भाजपा गठबंधन टूट गया। दोनों दलो की विचार हौदियां (थिंक टैंक) इससे होने वाले नफ़ा नुकसान का आंकलन करने में जुट गए। राजनीतिक पंडितों और न्यूज़ चैनलों को लंबे समय तक चलाने के लिए मसाला मिल गया। लेकिन इन सब के बीच देशहित का क्या? जनहित का क्या? जिस मुद्दे को इस अलगाव का आधार बनाया गया है वह एक छ्द्म आधार है। नितीश भले ही कितनी सफ़ाई दें पर जब भी ये सवाल खड़ा होगा कि यदि धर्मनिरपेक्षता का इतना ही ख़्याल था तो उस समय ही अलग हो जाते जिस समय गुजरात में दंगे हो रहे थे। भले ही वाजपेयीजी का बहाना बनाकर नितीश इसका जवाब देने की असफल कोशिश करें लेकिन वाजपेयी जी को सक्रिय राजनीति से दूर हुए भी काफी वक्त गुज़र चुका है, तब अलग हो जाते! खैर, वो कोई मोदी या धर्मनिरपेक्षता के कारण अलग नहीं हुए हैं ये वो भी जानते हैं। परन्तु इस देश की जनता तो सदियों से मूढ़ समझी जाती रही है और उसका आचरण भी कमोबेश वैसा ही है। ये बात मेरी समझ से परे है कि कैसे हिंदुत्व की बात करना सांप्रदायिक है और अल्पसंख्यकों की बात; और उनमें भी सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिमों की बात करना धर्मनिरपेक्षता। पता नहीं इस देश की जनता ये क्यों नहीं सोच पाती। भाजपा ने भी समय-समय पर गंभीर गल्तियां की हैं जिसकी वजह से आज उसकी ये हालत है। ज़रा याद कीजिए वाजपेयीजी का वो दौर जब उन्होंने एक वोट के कारण सरकार की बलि चढ़ा दी मगर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। आखिर क्यों भाजपा अगला चुनाव "राष्ट्रवाद बनाम भ्रष्टाचार;राजद्रोह;अराजकता;छद्म धर्मनिरपेक्षता" जैसे मुद्दों पर नहीं लड़ती? विपक्षी आरोप लगाते हैं कि आप सांप्रदायिक हैं और आप चल पड़ते हैं सफ़ाई देने। आप क्यों इस बात को नहीं कहते इस राष्ट्र के हित में जो भी हैं वो सब हमारे हैं और जो राष्ट्रहित के विरोधी हैं वो हमारे शत्रु हैं। आप देश के सामने उचित व सही तथ्यों को रखिए। जब भी गुजरात दंगों की बात आती है तो आप क्यों गोधरा का ज़िक्र करना भूल जाते हैं? यहां मेरा तात्पर्य ये कतई नहीं गुजरात में जो हुआ वह सही है। परन्तु गोधरा में जो हुआ वह भी सही नहीं था। बहरहाल, ये राजनेताओं की चालें हैं और वो अपने निजी लाभ के लिए इन्हें चलते रहेंगे। मेरी सभी देशवासियों से अपील है कि वो इन छद्म चेहरों को जल्द से जल्द पहचान ले और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर अपनी अगली सरकार चुनें।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 15 जून 2013

शरद जोशी प्रसंग

स्व. श्री शरद जोशी
म.प्र.साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी पर केन्द्रित कार्यक्रम "शरद प्रसंग" में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां प्रदेश के मूर्धन्य साहित्यकारों ने शरद जोशी एवं उनके व्यंग्य लेखन पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इसी क्रम में साहित्यकार श्री अशोक जमनानी जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जब मुझे शरद जोशी की बात करनी होती है तो मैं हरिशंकर परसाई से शुरू करता हूं। क्योंकि उनके व्यंग्य का केन्द्र राजनीति थी और जब उनसे इस बाबत पूछा जाता कि आप राजनीति पर ही क्यों लिखते करते हैं तो वे कहते कि "मेरी चाय की प्याली में कितनी शकर होगी ये जब राजनीति ही तय करती हो तो मैं राजनीति पर क्यों ना लिखूं।" लेकिन शरद जोशी से जब पूछा जाता कि आप लोक पर क्यूं लिखते हैं तो उनका जवाब होता कि "मैं एक-एक पत्ते को साफ करना चाहता हूं जिससे जड़ें स्वस्थ हो सकें।" विद्वान साहित्यकार ने कहा कि इसीलिए शरद जोशी कहीं आगे हैं। मेरे देखे हरिशंकर परसाई व शरद जोशी दोनों ही करीब-करीब जड़ की बात कर रहे हैं, या यूं कहें कि हरिशंकर परसाई तने की और शरद जोशी विशुद्ध रूप जड़ की बात कर रहें हैं क्योंकि जिस राजनीति को आज नीति-नियंता माना जा रहा है उस राजनीति की जन्मदात्री संस्था और उद्ग्म का मूल स्रोत तो "लोक" ही है। लोकतंत्र से राजनीतिक सरकारें बनती हैं, जो हमारे चाय की प्याली में कितनी शकर होगी, हमें साल में कितने सिलेंडर मिलेंगे, हमारी सब्जी में टमाटर होंगे या नहीं;आलू-प्याज होंगे या नहीं ये सब तय करती है। आज ऐसे कितने व्यक्ति हैं जो राष्ट्रहित को ध्यान रखकर अपना मत देते हैं? आज के जनप्रतिनिधियों का चुनाव नितांत व्यक्तिगत हितों के आधार पर होता है। तो मेरे देखे सब समस्याओं की जड़ व समाधान "लोक" ही है इसलिए शरद जोशी ने मूल रूप से जड़ पर ही प्रहार किया है इसलिए वे व्यंग्यकारों में अग्रणी हैं।

शुक्रवार, 14 जून 2013

रविवार, 9 जून 2013

परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव से भेंट-

परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव
कल शाम मुझे एक मित्र के माध्यम से पता चला कि रात्रि १०:३० बजे श्रीधाम एक्सप्रेस से देश का गौरव परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव गुजरने वाले हैं। वे यहां कुछ देर रुकेंगे। मैंने तुरन्त अपने कुछ खास मित्रों को सूचित किया और हम सभी फूल-मालाएं लेकर उनके दर्शन हेतु रेल्वे स्टेशन पहुंच गए। मिलट्री मेन की संगत का असर देखिए कि ट्रेन ने भी अपने पूर्ण अनुशासन के साथ ठीक समय पर स्टेशन पर आमद दी। जैसा कि बताया गया था कि श्री यादव बी.१ के वातानुकूलित कोच में यात्रा कर रहे हैं। जैसे ही ट्रेन का बिगुल सुनाई दिया तनमन में एक अजीब सा स्पंदन होने लगा। ट्रेन के आते ही मैं अपने मित्रों सहित बी.१ कोच की ओर दौड़ा। गाड़ी के रुकते ही कोच का दरवाज़ा खुला और उसमें से एक मझौले कद और गठीले बदन वाला युवक सिर पर टोपी लगाए ठीक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मैंने देखते ही पहचान लिया कि यही श्री योगेन्द्र यादव हैं परन्तु रोमांच के कारण मैं हाथ में माला लिए किंतर्तव्यविमूढ़ सा स्तब्ध खड़ा रहा। परमवीरचक्र विजेता मेरे सामने थे और मैं जड़वत खड़ा था। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? इतने में मुझे किसी मित्र का धक्का लगा जिससे मैं अपने आप में वापस आया और तत्काल मैंने माला उनके गले में पहना दी। उन्होंने मुस्कुराकर मेरा अभिवादन स्वीकार किया। मैं उनके चरण छूने को झुका तो उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए। मैंने कहा-सर,आज जीवन धन्य हो गया। इस पर वो बोले-"वो तो मेरा फ़र्ज़ था।" इसके बाद सभी मित्रों ने उन्हें फूलमाला पहनाकर उनका अभिनंदन किया। इतने में ट्रेन की बिगुल एक बार फिर बज उठा और श्री यादव ने हाथ हिलाकर एवं "भारतमाता की जय" के साथ हम सभी को अलविदा कहा। एक अभूतपूर्व गौरव का क्षण हमारी झोली में सौगात के रूप में डाल कर श्री यादव ने हमसे विदा ली। इस अवसर पर मेरे साथ कवि एवं साहित्यकार श्री संतोष व्यास, सर्वब्राह्मण समाज की युवा शाखाध्यक्ष प्रियंक दुबे, शशांक दुबे, रवि दुबे व लल्ला सहित कई मित्र उपस्थित थे।
श्री योगेन्द्र यादव जी के अदम्य साहस का पूर्ण वर्णन यहां देखें-
http://www.bharat-rakshak.com/HEROISM/Yadav.html 

शुक्रवार, 7 जून 2013

स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमण्डल-

१. पं. जवाहरलाल नेहरू-प्रधानमंत्री, विदेश, कामनवेल्थ संबंध
२. सरदार वल्लभभाई पटेल-होम अफेयर, सूचना और प्रसारण, राज्य
३. डा. राजेन्द्र प्रसाद-खाद्य और क्रषि
४. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद-शिक्षा
५. डा. जान मथाई-रेल्वे एवं परिवहन
६. सरदार बल्देव सिंह-रक्षा
७. जगजीवन राम-श्रम
८. सी.एच.गामा-वाणिज्य
९. रफी अहमद किदवई-संचार
१०. राजकुमारी अम्रत कौर- स्वास्थ्य
११. डा.बी.आर.अंबेडकर-विधि
१२. आर.के.षणमुख चेट्टी-वित्त
१३. डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी-उद्योग एवं आपूर्ति
१४. एन.वी.गाडगिल-कार्य खदान एवं उर्जा
*** (सरदार वल्लभभाई पटेल २३ अगस्त को उप-प्रधानमंत्री बनाए गए।)

शुक्रवार, 31 मई 2013

"कोई रिटायर हो गया है"

मित्रों, मन में कुछ भाव उमड़े तो उन्हें लिपिबद्ध करने के लिए मैं अपना पी.सी.चालू कर ही रहा था कि तभी कानों में ढोल-नगाड़ों और पटाखों की तेज़ आवाज़ गूंजी तो बच्चों की सी उत्सुकता से झट बालकनी में जाकर देखा तो फूलों से सजी गाड़ियों का एक लंबा काफ़िला चला जा रहा था। मैंने जब किसी से पूछा- "ये क्या माजरा है? तो जवाब मिला -"कोई रिटायर हो गया है।" उसके इस जवाब ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया मैं सोचने लगा कि आखिर रिटायर होकर ऐसी कौन सी विशेष बात कर दी गई है जो इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है। आखिर देश के लिए ऐसा कौन सा महान कार्य कर दिया गया, या समाज को ऐसी कौन सी नई दिशा दे दी गई जिसके लिए इस प्रकार ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला जा रहा है। फिर सोचा रिटायर होने वाला सोचता होगा कि इतना भ्रष्टाचार किया,इतने घोटाले किए,इतने फर्ज़ी आंकड़े दिए और सरकारी सुविधाओं का जमकर दुरूपयोग किया, पर कहीं पकड़े नहीं गए। शायद इसी का जश्न मना रहे हैं। आजकल रिटायर होने के बाद स्वरूचि भोज का चलन भी ज़ोरों पर है। ऐसे ही एक भोज में मुझे भी बे-मन से जाना पड़ा क्योंकि मेरे मित्र के पिताजी रिटायर हो गए थे, हालांकि उन्होंने भी कोई तीर नहीं मारा था रिटायर होकर जैसे सब होते हैं वैसे ही वे भी हो गए थे, बिल्कुल सहज व निर्लिप्त भाव से; कम से कम उन्होंने तो यही दिखाने का प्रयास किया था। अब ये बात और है कि उन्होंने "एक्सटेंशन" के भरपूर प्रयास किए थे पर जब नहीं मिला तो वे गीता के उपदेश "लाभालाभौ जयाजयो" को आत्मसात करते हुए निर्मोही भाव से रिटायर हो गए...,तो उस भोज में मैंने देखा कि वहां बाकायदा उन्हें शादी-विवाह की भांति कपड़े इत्यादि की भेंट दी जा रही थी। जहां तक मैं उन्हें जानता हूं वे शायद ही कभी समय पर अपने कर्तव्यस्थल पर उपस्थित हुए हों। लंच टाइम की अगर बात करें तो वे उसका इस कदर फायदा उठाते थे कि जितने वक्त में उनका भोजन होता उतने समय में एक छोटा-मोटा सहभोज निपट जाए। फिर भोजन के उपरांत अगर विश्राम नहीं किया तो क्या खाक "लंच" किया। ऐसी शैली की सेवा के उपरांत इस प्रकार विदाई सहज हज़म नहीं होती। ठीक है आपने इतने दिन जिन सहकर्मियों के साथ कार्य किया उनसे विदा लेते वक्त उन क्षणों का मार्मिक हो जाना स्वाभाविक है। अच्छा हो उसमें उन बातों को, उन व्यक्तियों को याद किया जाए जिन्होंने आपके जीवन पर कुछ सकारात्मक प्रभाव डाला। क्या कभी किसी अधिकारी ने रिटायर होते वक्त अपने "प्यून" को गले लगाकर उसका आभार प्रकट किया है, या उससे अपने सेवाकाल में अपने द्वारा जाने कितनी बार डांटे-फटकारे जाने के लिये क्षमाप्रार्थना की है? शायद किसी ने नहीं। क्योंकि अक्सर लोग इस अवसर का सही मूल्यांकन ही नहीं करते। करें भी कैसे आजकल की जीवन शैली में हार्दिक बातों को हमारे द्वारा सबसे निचले पायदान पर रखा जाता है और दिखावे व भौतिक चमक-दमक को सबसे ऊंचे पर। यदि आर्थिक संपन्नता के चलते उत्सव करना आवश्यक ही है तो अच्छा हो कि कुछ प्रकार का आयोजन किया जाए जिससे ज़रूरतमंदों को मदद मिले। क्यों ना इस अवसर किसी निशक्त बच्चे को पढ़ाने का, किसी गरीब कन्या के विवाह में सहयोग का, किसी बीमार के इलाज का संकल्प लिया जाए। मेरे देखे इस प्रकार के भौतिकतावादी उत्सव तो उचित नहीं। ज़रूर कुछ लोग ऐसे निश्चित होंगे जिनके कार्य इस प्रकार के उत्सव व आयोजनों के योग्य हों; उनके लिए ये होना भी चाहिए परन्तु हर रिटायर होने वाला इसे एक परंपरा की तरह निर्वहन करे ये एक गलत परंपरा की शुरूआत है।
-हेमन्त रिछारिया
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क्षमावाणी-
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(मेरे इस व्यंग्य से जिन भी रिटायर्ड सज्जनों को जाने-अनजाने में कोई ठेस पहुंची हो तो उसके लिए मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूं। मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इस गलत परंपरा का विरोध करना है।)
-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 26 मई 2013

अर्ज़ किया है-

 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"

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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
 इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
 लोगों को सच की आदत जो नहीं"

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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस मुल्क का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

-हेमन्त रिछारिया
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दुर्लभ चित्र

फ़िल्म कलाकरों के साथ भू.पू. प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गाँधी

रिक्त


रिक्त


रिक्त


शनिवार, 25 मई 2013

कुछ नए शेर...

"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकर  गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों की आरज़ू थी चांदनी बिखरे
रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं"


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"तुम छलकने का शिकवा ना करो
उसका पैमाना ही छोटा है"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना"


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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

-हेमन्त रिछारिया
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रविवार, 19 मई 2013

एक ग़ज़ल

मेरे शहर में हर सूं ये मंज़र क्यूं है
शीशे के घर हाथ में पत्थर क्यूं है

जब खाक में मिलना हश्र है सबका
फिर हर शख़्स बना सिकंदर क्यूं है

गाहे-बगाहे दिल का टूटना माना
ए मौला ये होता अक्सर क्यूं है

ये कसक उसे चैन से सोने नहीं देती
पड़ोसी का मकां घर से बेहतर क्यूं है

जो बुझा नहीं सकता तिश्नगी किसी की
मेरे साहिल से हो बहता वो समंदर क्यूं है

वो भी किसी की बहन,किसी की बेटी है
उसकी जानिब तेरी ये बदनज़र क्यूं है

-हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 3 मई 2013

राष्ट्रीय सम्मान का बनता मज़ाक-

पंजाब सरकार ने आज विधानसभा में एक प्रस्ताव पास करके सरबजीत सिह को "शहीद" का दर्ज़ा प्रदान कर दिया। सियासतदानों ने जहां इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करके अपनी नाकामियों को छुपाने का प्रयास किया वहीं दूसरी "शहीद" शब्द की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सरबजीत के साथ जो हुआ वह निश्चय ही बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है परन्तु इस का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम सरबजीत की तुलना देश के लिये अपनी जान दांव पर लगा देने वाले हमारे जवानो और शहीदों से करें। मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह है परन्तु भावनाओं का इस प्रकार अतिश्योक्तिपूर्ण अनुचित प्राकट्य सर्वथा एक गलत परंपरा की शुरूआत है।
अभी कुछ महीनों पहले १६ दिसंबर की शिकार युवती को भी राजकीय सम्मान देने की वकालत एक राजनेता द्वारा की गई थी। आखिर हम इस प्रकार की पहल करके साबित क्या करना चाहते हैं? यदि हम अपने नागरिकों की जान और इज़्ज़त की सुरक्षा नहीं कर पाते तो उन्हें इस प्रकार के मरहमों से सहलाकर या उपक्रत कर और उन्हें सरकारी अहसानों तले दबा कर उन्हें खामोशी का दामन ओढ़ने का मूक इशारा करते हैं। अपनी इस ओछी मानसिकता और राजनीति में हम ये भूल जाते हैं कि इससे इन शब्दों और सम्मानों के वास्तविक हकदारों के सम्मान को ठेस पहुंचती हैं। भावनाओं में बहकर परिजनों का इस प्रकार की मांग करना अलग बात है परन्तु सरकार को इस प्रकार की मांग स्वीकार करने से पहले हर पहलू पर विचार करना चाहिए। इस प्रकार के लोकप्रियता हासिल करने वाले हथकंडे अपनाने से बेहतर है कि हम अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए ठोस और कारगर नीति बनाएं। अभी कुछ दिनों पहले शहीद हेमराज का सिर काटकर ले जाने घटना के पश्चात जब पाकिस्तान के हुक्मरान भारत आए तो भारत के विदेश मंत्री उनका स्वागत सत्कार करने जा पहुंचे अच्छा होता विदेश मंत्री अजमेर शरीफ के काज़ी की भांति उनसे इनकार कर नापाक मुल्क को कड़ा संदेश देते। अपने नागरिकों पर हुए हमले का जिस प्रकार बदला अमेरिका ने लिया है वह सही मायने में हमले में हताहत हुए नागरिकों को सच्ची श्रद्धांजली है। सरकार अगर अपने नागरिकों को सही अर्थों में श्रद्धांजली देना चाहती हैं तो उनकी जान और इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करने वालों पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे ना कि अपने विरूद्ध उपजे आक्रोश को शांत करने के लिए इस प्रकार राष्ट्रीय सम्मानों व सम्मान सूचक शब्दों का अवमूल्यन कर एक गलत परम्परा की शुरूआत करे।

गुरुवार, 2 मई 2013

एक था सरबजीत...

आखिरकार सरबजीत सिंह रिहा हो गया; पाकिस्तान की कैद से नहीं बल्कि ज़िंदगी की कैद से। जो कुछ भी हुआ वो सरबजीत का नसीब था; पाकिस्तान की बर्बरता थी; हमारी सरकार का लचर रवैया था या फिर ये तीनों मगर एक हकीकत को हमें दिल में टीस और आंखों में आंसू लिए स्वीकार करना ही होगा कि सरबजीत अब हमारे बीच नहीं रहा। इसके लिए जितनी दोषी पाकिस्तानी सरकार है उतनी ही ज़िम्मेवार भारत सरकार भी है। आज हमारी विदेश नीति इतनी लचर और तुष्टिकरण से भरी हुई है कि इसके लिए वो किसी भी हद समझौता करने को तैयार है चाहे वो कैप्टन सौरभ कालिया हो, चाहे हमारे सेना के जवान जिनका सर काट दिया जाता है और हमारी सरकार खामोश बैठी रहती है इतना नहीं पाकिस्तानी हुक्मरानों का स्वागत सत्कार करने में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ती। सत्तारूढ़ दल के नेता अपनी इसी तुष्टिकरण नीति के चलते कभी ओसामा को ओसामा जी कहते हैं तो कभी दुर्दांत आतंकी हाफिज़ सईद को मि. हाफ़िज़ सईद कहते नज़र आते हैं। यदि भारत सरकार का ऐसा ही लचर रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक गंभीर संकट के मुहाने पर होंगे। आज चीन हमारी सीमा १९ किमी अंदर तक घुस आता है और हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि मामले को अधिक तूल ना दिया जाए। धिक्कार है ऐसे प्रधानमंत्री और सरकार पर जो अपनी तुष्टिकरण की नीति के चलते अपने देश की सीमा और देशवासियों की जान तक को दांव पर लगा देते हैं। यदि समय रहते ऐसी दुर्बल सरकार को सत्ता से उखाड़ नहीं फेंका गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक बार फिर से गुलामी की
जंजीरों के करीब होगा।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

याद तुम्हारी...

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन कलश भरे,
जैसे कोई किरण अकेली
पर्वत पार करे।
लौट रही गायों के संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे,
जब इकला कपोत का जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे,
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

-कवि माहेश्वर तिवारी

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो....

यदि आपसे पूछा जाए कि क्या आप जानते हैं कि हाल ही में रूपए के जिस चिन्ह को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई, उसके जनक कौन है? तो आप कहेंगे- डी उदया कुमार! यूं तो बिल्कुल ठीक कहा आपने लेकिन क्या आप जानते हैं कि डी उदया कुमार कौन हैं और ये रूपए के चिन्ह का चयन करने वाली प्रतियोगिता में विजेता कैसे बने? यदि नहीं तो हम आपको बताए देते हैं कि डी उदया कुमार डीएमके के पूर्व विधायक धर्मालिंगम के पुत्र है जो उस समय केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकार में शामिल थी। डी उदया कुमार किस प्रकार नियमों का खुलेआम उल्लंघन करके इस प्रतियोगिता के विजेता बन गए इसे जानने के लिए पढ़िए "तहलका" का १५ अप्रैल का अंक। "तहलका" संवाददाता राहुल कोटियाल की इस रिपोर्ट से आपको पता चलेगा कि ये राजनेता अपने राजनैतिक लाभ के लिए किस हद तक गिर सकते हैं।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

चूक गए चौहान

 म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी बेदाग छवि के लिए भले ही जाने जाते हों परन्तु भोपाल की रोहित नगर सोसायटी घोटले ने उनकी छवि पर दाग ज़रूर लगाया है। अपने मंत्रियों और नौकरशाहों पर लगाम ना लगा पाने के कारण समय-समय पर उनकी आलोचना होती रही है। पूर्व में भी डंपर कांड को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर थे। इस पूरे मामले में भी उनकी छवि धूमिल हुई थी। हाल ही में खोजी पत्रिका "तहलका" ने अपने ताज़ा अंक में भोपाल की रोहित नगर सोसायटी के घोटाले से संबंधित तथ्यों का उल्लेख किया है वे निश्चित ही चौंकाने वाले हैं। इसमें सीधे तौर पर भले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान पर आरोप ना लगाया गया हो परन्तु विपक्ष और मीडिया ने उन्हें संदेह व सवालों के घेरे में अवश्य ही खड़ा कर दिया है। सबसे चौकाने वाली बात है कि शिवराज सिंह की ओर से इस मामले को लेकर अब तक कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। मध्यप्रदेश में कुछ ही महीनों बाद चुनाव होने वाले हैं यदि मुख्यमंत्री का यही रवैया रहा तो हो सकता है कि पांव-पांव वाले भैया के लिए तीसरी बार सत्ता की दौड़ कांटो भरी होगी।

(रोहित नगर सोसायटी घोटाले के बारे में विस्तार से जानने के लिए "तहलका" पत्रिका का १५ अप्रैल २०१३ का अंक देखें या नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।)

http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/1727.html

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

ताजमहल या तेजो महालय.....!


प्रो.पुरूषोत्तम नागेश ओक (पी.एन.ओक) ने अपनी पुस्तक "ताजमहल; तेजोमहालय शिव मन्दिर है"व "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"में ताजमहल को शिव मन्दिर के रूप में मान्यता दी है। इस तथ्य के परीक्षण के लिए ये पुस्तकें पढ़ें और नीचे दिया गया लिंक देखें-
http://www.youtube.com/watch?v=bR4dNufCr8c

(निवेदन-इस लिंक से हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म या संप्रदाय की भावनाएं आहत करना नहीं है। ना ही ये वीडियो हमारे द्वारा अपलोड किया गया है। हमारा उद्देश्य श्री पी.एन.ओक द्वारा अपनी पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" व "ताजमल-तेजोमहालय शिव मन्दिर है" में उद्धत तथ्यों से आपको परिचित करवाना है। हम इन तथ्यों की प्रामाणिकता के बारे में कोई दावा नहीं करते।)

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

शेर अर्ज़ किया है...

" इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
  मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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" अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
  जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"
 
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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को "

-हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

फथपुर सीकरी बना फतेहपुर सीकरी -

श्री पी.एन.ओक की पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" नामक पुस्तक के कुछ तथ्य निश्चित ही अकाट्य व सहज ग्राह्य हैं जैसे- यह तथ्य भी सहज ही ग्राह्य होने जैसा है कि जो भी मकबरे वर्तमान में जिस शहंशाह के नाम से संबंधित है उसी शंहशाह के महल का कहीं कोई वर्णन क्यों नही मिलता? वहीं अधिकतर स्मारकों व नगरों का हिन्दू नामों के समकक्ष व संस्क्रत का अपभ्रंश होना व इनके शासकों का इन्हें अपने नाम से जोड़ना। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
१.फतेहपुर सीकरी- फथपुर सीकरी-सीकरी शब्द सीकर से बना है जो कि संस्क्रत के शब्द "सिकता" से संबंधित है जिसका अर्थ है-रेत। राजस्थान के एक प्रमुख स्थान को "सीकर" के नाम से पुकारा जाता है। सीकर से आए हुए व्यक्तियों के लिए ही "सीकरी" शब्द प्रयुक्त होता था। संस्क्रत में "पुर" प्रत्यय भी बस्ती का द्योतक है। इससे यह सिद्ध होता है यह नगर एक राजपूत नगर था जो बाद में विजित होकर "फतेहपुर सीकरी" बना।
२. अहमदाबाद-(अहमद शाह)-कर्णवती या राजनगर
३. औरंगाबाद-(औरंगज़ेब)-कटकी या खड़की
४. होशंगाबाद-(होशंगशाह)-नर्मदापुर
५. अहमनगर-अम्बिका नगर
६. अजमेर- अजय मेरू
७. आगरा- अग्र

"भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"-(प्र.क्रं.-६४-७४)

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

लाल किला या लाल कोट

मित्रों हाल ही में पी.एन.ओक की पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" पढ़ी। इसे पढ़कर मेरे मस्तिष्क के तंतु झनझना उठे और मन अत्यंत पीड़ा से भर गया। इस पुस्तक को पढ़ने के उपरांत जो तथ्य जानकारी में आए उनसे यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार हमारे अपने स्मारकों,भवनों,महलों व मन्दिरों को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने अपनी आरामगाह व इबादत स्थल बनाकर उन्हें अपने नाम से दुष्प्रचारित किया है। इतना नहीं हमारे पूरे इतिहास के वास्तविक तथ्यों से छेड़छाड़ कर उसे विक्रत कर दिया। आज़ाद भारत के प्रथम शासक इस बात से अनजान बने अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रहे। जिनका दायित्व सबसे पहले भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित करने का था। वे इस प्रकार के दुष्प्रचार के प्रति अत्यंत उदासीन रहे। इसका असर यह हुआ कि आज हम उन्हीं दुष्प्रचारों को प्रामाणिक तथ्य मानकर स्वीकार किए हुए हैं। आज की पीढ़ी ऐसे ही दुष्प्रचारों को वास्तविक व प्रामाणिक तथ्य मानकर समादर देती जा रही है और शायद आने वाली पीढ़ियां भी देती रहेंगी। आज हम अपने उन स्मारकों के वास्तविक रूप व निर्माताओं से अनजान हैं जो कभी हमारे देश का गौरव हुआ करते थे। ऐसे कुछ स्मारकों की चर्चा मैं यहां करना चाहता हूं व उनके वास्तविक रूप से आपका परिचय करवाना चाहता हूं। ये सभी तथ्य उसी पुस्तक से लिए गए हैं जिसका उल्लेख मैंने पूर्व में किया है। यहां मेरा उद्देश्य आप सभी मित्रों को उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना है, जिसका नाम है-"भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"। तो आईए जानते है उन स्मारकों के बारे में-
 स्मारक--वास्तविक रूप व नाम-
१. ताजमहल--राजपूताना महल जिसमें शिव मन्दिर था-तेजोमहालय
२. लाल किला--राजा प्रथ्वीराज का महल-लाल कोट
३. कुतुबमीनार--नक्षत्र विद्याध्ययन के लिए बनाय गया वेध-स्तंभ जिसका प्रयोग विक्रमादित्य के 
                       --विश्वविख्यात  ज्योतिषी "मिहिर" किया करते थे।
४. डल झील--दल झील (पत्ता या पल्लवगुच्छ)
५. सोनमर्ग--स्वर्ण मार्ग
६. गुलमर्ग--गौरिमार्ग
७. वेरिनाग--वारिनाग (संस्क्रत का शब्द जो "जल-सर्प" का द्योतक है)
८. शेख सल्ला दरगाह--पुण्येश्वर व नारायणेश्वर मन्दिर पूना में स्थित
ये तो बस बानगी है ऐसे कई उदाहरणों के लिए पढ़िए "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" लेखक पी.एन.ओक।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

संजय दत्त को नहीं मिलेगी माफ़ी..!

 यदि पूरे घटनाक्रम को ज्योतिषीय नज़र से देखें तो संजय दत्त इस समय गुरू की महादशा और राहु की अंतर्दशा भोग रहे हैं। जो २४ अप्रैल २०१४ तक रहेगी। संजय दत्त की कुण्डली में गुरू ना सिर्फ द्वादश स्थान अर्थात कारावास के स्थान का स्वामी है बल्कि दण्डाधीश शनि अधिष्ठित राशी का स्वामी भी है। अंतर्दशानाथ राहु गुरू से द्वादश स्थान में स्थित है। जो अपनी भुक्ति में मानहानि व विपत्ति का संकेत दे रहा है। वहीं गोचर में भी राहु के अनिष्ट भाव में भ्रमण होने से उक्त बातें प्रमाणित हो रही है। गोचर में गुरू व्रष राशि में स्थित है अपनी राशि से गुरू का प्रथम भाव में गोचर संजय दत्त के लिए अनिष्टफलकारक है जो राजभय व मानहानि व अपने घर से दूर निवास का संकेत दे रहा है। जन्मकालीन गुरू पर से वर्तमान में शनि-राहु गोचर कर रहे हैं इस गोचर से भी मानहानि-राजभय का संकेत मिल रहा है। इसलिये इस अवधि में उनके कारावास जाने के प्रबल योग हैं। उन्हें अल्प समय के लिए ही सही जेल जाना ही होगा। अप्रैल २०१४ के बाद उनकी सज़ा माफ़ हो सकती है और वे रिहा हो सकते हैं।
 
*(उक्त गणना एक पत्रिका से प्राप्त कुण्डली के आधार पर की गई है जो संजय दत्त की बताई गई है। इसकी प्रमाणिकता के बारे में हम कोई दावा नहीं करते। यह उस कुण्डली का फलादेश है।)

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

संजय दत्त को माफ़ी क्यों...?

 प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने संजय दत्त की माफ़ी को लेकर मुहिम क्या शुरू की सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने भी उनके सुर में सुर मिला दिया। इस मुहिम का फायदा भले ही कांग्रेस व जस्टिक काटजू को मिले ना मिले पर इसका अच्छा-खासा नुकसान संजय दत्त को ज़रूर भुगतना पड़ेगा। ये बात शायद संजू बाबा भी बखूबी जानते हैं तभी तो उन्होंने पत्रकार वार्ता में हाथ जोड़कर इस मुहिम से छिड़ी बहस को तत्काल बंद करने के लिए बड़ी ही आर्त गुहार लगाई। माफ़ी की इस मुहिम ने जहां एक ओर इस देश की जनता की याददाश्त पे पड़ी गर्द को साफ किया वहीं आम नागरिकों व बुद्धिजीवियों को इस बात पर सोचने के लिए विवश भी किया कि क्या वाकई संजय दत्त निर्दोष या मासूम हैं?आए दिन मीडिया में हो रहे खुलासों को देखकर तो यही लगता है कि संजय दत्त ने मुंबई बम कांड की साजिश में भले ही हिस्सा ना लिया हो पर उन्होंने इसे रोकने की दिशा में कोई सार्थक पहल भी नहीं की थी। उस समय लगभग ३४ साल के इस तथाकथित मासूम ने ना सिर्फ अबू सलेम जैसे अपराधी को अपने घर बुलाया वरन बमकांड के गुनहगारों से लगातार संपर्क बनाए रखा, इतना ही नहीं जमानत पर रिहा होने के बावज़ूद भी उसके यह संबंध जारी रहे। काटजू साहब ने बैठे बिठाए संजय दत्त की छवि की जो गत बनाई है उसे शायद ही कोई सुधार पाए। उनकी इस मुहिम से मीडिया को लंबे समय तक चलने वाला मसाला मिल गया और देश की जनता जो धीरे-धीरे इस गुनाह की गंभीरता को भूलती जा रही थी उसे भी एक ही झटके में सब कुछ याद दिला दिया। जो नागरिक संजू बाबा के साथ सहानुभूति रखने लगे थे इन कुछ दिनों में वे आए दिन होने वाले खुलासो को देखकर अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे हैं। वहीं कुछ विद्वान जो माफ़ी के पक्षधर हैं ये कहते नहीं थकते कि सजा तो वे पिछ्ले २० सालों से भुगत रहे हैं। अब ज़रा इन २० सालों पर भी गौर करें तो आप पाएंगे कि इन गुज़रे बीस सालों में संजय दत्त विवाह बंधन में बंध चुके हैं। उनकी २ संताने हो चुकी हैं। वे कई फिल्में भी साइन कर चुके हैं। कुछ फिल्में रिलीज़ होने के साथ-साथ सुपरहिट भी हो चुकी है जिससे उनके करियर में उन्नति हुई है। वो कई बार शूटिंग के सिलसिले में विदेश की सैर भी कर चुके हैं। एक राजनीतिक दल में शामिल होकर महासचिव का पद भी संभाल चुके हैं। यदि इन्ही सब बातों को सज़ा भुगतना कहते हैं तो ईश्वर से ऐसी सज़ा कौन नहीं चाहेगा। मेरा मानना है कि जो अच्छी छवि व सहानुभूति एक गुनहगार को अपने गुनाह को कबूल करके व उसके प्रायश्चित स्वरूप मिली उस गुनाह की सज़ा को भुगत कर प्राप्त होती है वह इस प्रकार रसूख का इस्तेमाल करके मिली माफ़ी से प्राप्त नहीं होती। संजय दत्त के शुभचिंतको को चाहिए कि वे उन्हें सज़ा भुगत कर प्रायश्चित करने दें जिससे इस देश की जनता उन्हें ह्रदय से माफ़ कर सके।

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

संगीत सम्राट "तानसेन" द्वारा रचित गणेश वंदना

उठि प्रभात सुमरियै, जै श्री गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अंधन को नेत्र देत, कुष्ठी को काया।
बंध्या को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।
मस्तक सिंदूर सोहै, मूसक असवारी॥
फूल चढ़ै पान चढ़ै, और चढ़ै मेवा।
मोदक को भोग लगे, सुफल तेरी सेवा॥
रिद्धि देत सिद्धि देत, बुद्धि देत भारी।
"तानसेन" गजानंद, सुमिरौ नर-नारी॥

-तानसेन

तानसेनः एक परिचय

तानसेन
नाम-त्रिलोचन पांडे (तनसुख, तन्ना) तानसेन
पिता का नाम- मकरन्द पांडे
माता का नाम- कमला पांडे
जन्म स्थान- बेहट गांव (ग्वालियर से २८ मील दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित)
पत्नी का नाम- हुसैनी व मेहरून्निसा (मेहर) अकबर की पुत्री
पुत्र-तानतरंग,विलास खां,हमीरसेन,सूरतसेन
पुत्री-             सरस्वती
दामाद-         मिसरी सिंह
राज दरबारी गायक- १. राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर)
                               २. राजा रामचंद्र बघेल (रीवा नरेश)
                               ३. शहंशाह अकबर (हिंदुस्तान) के नौ रत्नों में से एक
रचित ग्रंथ-              १. संगीत सार
                               २. रागमाला
                               ३. गणेश स्तोत्र

शहंशाह अकबर के नौ रत्न

अकबर

१. राजा बीरबल
२. राजा मानसिंह कछवाहा
३. राजा टोडरमल
४. तानसेन
५. हकीम हुमाम
६. मुल्ला दोप्याजा
७. मलिकुश्शरा फैज़ी
८. अबुल फज़ल
९. अब्दुल रहीम खानखाना

मंगलवार, 12 मार्च 2013

होली के दोहे

"सरल-चेतना" के पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं-संपादक



बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार
चटक-मटक गोरी फिरे,पिया करे मनुहार।


बागों में रंग नाचते, सतरंगी सी शाल
फागुन थिरका पास में दहक उठे हैं गाल।


यह यायावर ज़िंदगी चलते-फिरते पांव
भर पिचकारी मार दे आए तेरे गांव।


दहक रहा टेसू खड़ा घूंघट में है पीर
बंधन सारे तोड़ कर गोरी हुई अधीर।


कजरारे नयना हंसे गाल बने गुलाब
रंग गुलाबी मन हुआ मिलने को बेताब।


गली-गली में हंस रहा यह रंगीला मास
फूलों के मधु गंध पर पिया नहीं है पास।


फागुन के दिन चार है, खुलकर खेलो फाग
रंगो का त्यौहार है,तन-मन दहके आग।


केशर से रंगी बदन,कस्तूरी सी रात
पायल बिछुए कर रहे चुपके-चुपके बात।

-प्रेमचंद सोनवाने

बुराईयों के अंत का प्रतीक है होली



डा.जगदीश गांधी
होली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से एक है। होली की हर कथा में एक समानता है कि उसमें "असत्य पर सत्य की विजय" और "दुराचार पर सदा़चार की विजय" का उत्सव मनाने की बात कही गई है। इस प्रकार होली मुख्यतः आनंदोल्लास तथा भाई-चारे का त्यौहार है। यह लोक पर्व होने के साथ ही अच्छाई की बुराई पर जीत सदाचार की दुराचार पर जीत व समाज में व्याप्त समस्त बुराईयों के अंत का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता व दुश्मनी को भूलकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं।
 किसी कवि ने कहा है-
         "नफरतों के जल जाएं सब अंबार होली में,
         गिर जाए मतभेद की हर दीवार होली में।
         बिछुड़ गए जो बरसों से प्राण से अधिक प्यारे,
         गले मिलने आ जाएं वे इस बार होली में॥

-डा.जगदीश गांधी
संस्थापक-प्रबंधक
सिटी मान्टेसरी स्कूल, लखनऊ (उ.प्र.)

नक्षत्र पुरूष-"बाबूजी"

बाबूजी
जीवन में यूं तो हम बहुत से लोगों से मिलते हैं, पर उनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके दिल में उतरकर आपके जीवन को एक नई दिशा दे जाते हैं। ऐसे ही लोगों को हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र-पुरूष" कहा है। ऐसे ही एक नक्षत्र-पुरूष हैं-"बाबूजी" यानि श्री राधेश्यामजी रावल। जिन्हें हम सभी प्यार से "बाबूजी" कहते हैं। आपको बाबूजी से थोड़ा परिचित करा दूं। उम्र सत्तर वर्ष की करीब, लंबा कद,गठा हुआ संतुलित शरीर, कम बालों के कारण माथे पर चंद्र सी आभा है। आंखो पर चश्मा लगाते हैं और पेंट-शर्ट पहनते हैं। ज़्यादातर पैदल ही चलते हैं। उनकी मुस्कुराहट को देखकर मुझे किसी दार्शनिक की एक बात स्मरण हो आती है कि" अच्छे व्यक्तियों की सुंदरता बूढ़े होने पर भी विद्यमान रहती है बस ये उनके चेहरे से उतरकर उनके दिल में आ जाती है"। सादा-जीवन;उच्च विचार की जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं "बाबूजी"। जीवन में कड़ा अनुशासन,असीम परोपकार से लबरेज़ जीवन शैली के धनी। वे जब तक यहां रहे हर सामाजिक कार्य में भागीदारी करते रहे। परोपकार को ही अपना धर्म माननेवाली कई संस्थाओं से उनका निकट का सम्बन्ध था। वे एक सच्चे स्वयंसेवक हैं। मैंने अपने जीवन में ऐसे बिरले ही देखें हैं जो इतनी विद्वता के साथ इतना सहज हो सकें। उनसे जब भी हम किसी विषय में कोई प्रश्न करते और यदि उन्हें पूरा पता नहीं है तो वे अत्यंत सहज स्वर में प्रतिउत्तर देते कि "मुझे इस विषय में जानकारी नहीं है, या कम है"। उनकी समय की पाबन्दी तो देखते ही बनती है, उनके समय संबधी अनुशासन से आप घड़ी मिला सकते हैं। छोटी-छोटी गोष्ठियों का उन्हें बड़ा शौक है। वे आए दिन अपने निवास पर गोष्ठियां आयोजित करते रहते हैं। गोष्ठी का निमंत्रण देने वे स्वयं उस मित्र के घर तक जाते हैं जिसे वे आमंत्रित कर रहे हों। एक बार मैंने उनसे निवेदन किया कि "बाबूजी मोबाइल का ज़माना है आप फोन कर दिया करो।" तो उनका उत्तर था कि "ये शिष्टाचार के नियमों के विरूद्ध है।" वे स्वयं अपने हाथों से स्वल्पाहार भी परोसते। "बाबूजी" बहुत अच्छा गाते हैं। हारमोनियम भी खुद ही बजाते हैं। श्रेष्ठ साहित्य में उनकी रूचि है। उनकी डायरी में कई कवियों की उत्क्रष्ट रचनाओं है। उनके पास अत्यंत दुर्लभ श्रेष्ठ साहित्य का विशाल संग्रह है। जिसे वे मित्रों के लिए सदा उपलब्ध रखते। ये समझ लीजिए कि वे निजी तौर पर एक पुस्तकालय ही चलाते हैं जो पूर्णतः निशुल्क है। ना जाने कितने मित्रों को उन्होंने श्रेष्ठ पुस्तकों से परिचित करवाया है। खैर... मिलना-बिछुड़ना तो जीवन-धारा का ही एक रूप है जिसमें प्रिय का मिलन और विछोह; नदी-नाव-संयोग की तरह ही होता है। जिसे हमें स्वीकार करना होता है। "बाबूजी" हमारे दिल में सदा बसे रहेंगे। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वो हम सबके प्यारे "बाबूजी" को दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करे।

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल

वक्त ने छोड़े हैं ऐसे अपने निशां
आईना देखते हैं तो डर जाते हैं

तू खुद को ना ख़तावार समझ
ये दीदें पराए गम से भर जाते हैं

तन्हा दीवारों से सिवा कुछ नहीं
कहने को हम भी "घर" जाते हैं

ताब-ए-सब्र पे यकीं है लेकिन
कुछ बोल हैं जो अखर जाते हैं

गुलों की दोस्ती में फा़सला रखना
नाज़ुक छुअन से बिखर जाते हैं

तेरा आस्तां ही अपनी मंज़िल है
लोगों से क्या कहें किधर जाते हैं

मादरे-वतन पे जिनको नाज़ नहीं
उनके अंजाम से सिहर जाते हैं

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

यौवन

यौवन क्या है? यह लपटों का संगम है
सरगम है ये अन्तर के तूफानों का,
यौवन अरमानों का सर्वोच्च शिखर है
है पुण्य-पर्व यह यौवन बलिदानों का।

क्या बात करें यौवन के दीवानों की
ज्वालामुखियों पर रास रचाते हैं वे,
देना पड़ता मस्तक तो दे देते वे
मस्तक देकर सम्मान बचाते वे।
-सरलजी

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

नेताजी नहीं थे "गुमनामी बाबा"

कुछ दिनों पहले एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बेटी अनीता बोस का साक्षात्कार प्रसारित किया गया। जब उनसे गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संबंध में पूछा गया तो उनका उत्तर था-"मैं उनसे मिली थी और मैंने एक क्षण में ही यह जान लिया था कि वो मेरे पिता नहीं हैं।"
-संपादक (जैसा मैंने सुना)

वनफूल

उपवन के सुमनों ने सम्मान सदा पाया
किसने जाना कब कौन कहा वनफूल खिला,
किसने जाना कब महका वह कब मुरझाया
कब बिखर धूल में वह अनदेखा फूल मिला।

इस भारत उपवन में जाने कितने वन-फूल खिले
वे अनदेखे-अनजाने ही चुपचाप झड़े,
माताओं के लाड़ले लाल जाने कितने
आज़ादी की मंज़िल के नीचे दबे पड़े।
-सरलजी

जय नाद

कर्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।

इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी

सिंह जननी

धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहां मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक मां की गोद तज कर; दूसरी की गोद।

ओज अंतस कर यहां कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूं उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत"; था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।

गर्जना उसकी विकट सुन, कांपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहां मेरी भावना का सो रहा आवेश।
-सरलजी

भगतसिंह की माताजी

                                शहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी देवी विद्यावती जी के साथ सरलजीशहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी देवी विद्यावती जी के साथ सरलजी

"मैं दंबूक बोदां हां"

पीठ थपथपा पूछ रहे-"बेटे ! तुम क्या करने बैठे?
कुआं खोद कर क्या तुम उसमें हो पानी भरने बैठे?
"नहीं;नहीं; चाचाजी ! मैं तो अच्छा बाग लगाऊंगा।
मैं दंबूक (बंदूक) बो रहा, दंबूकों का पेड़ उगाऊंगा।"

"अच्छा तुम बंदूक बो रहे पर फल किसे चखाओगे?
क्या चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे मार गिराओगे?"
"दंबूकों के फल चाचाजी मेरे दुश्मन खाएंगे,
चिड़िया के बच्चे तो मेरे साथ खेलने आएंगे।

"मुन्ने कौन तुम्हारा दुश्मन यह भी तो बतलाओ
चले निशाना किसे बनाने,यह भी मुझको समझाओ।"
"राज कर रहे जो भारत पर, वे सब अपने दुश्मन हैं
उन्हें भगा कर अपनी मां के हमें काटने बंधन हैं।"

-सरलजी
(भगतसिंह के पिता के मित्र श्री आनन्दकिशोर मेहता जो कांग्रेस कमेटी के मंत्री थे। उन्होंने भगतसिंह को खेत में बंदूक गड़ाते देखा। प्रश्न करने पर भगतसिंह ने उत्तर दिया "मैं दंबूक बोदां हां"। उस समय बाल भगत बंदूक को "दंबूक" कहता था।)

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

कौन श्रीकृष्ण सरल?


"नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊं
सरल शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊं"
यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण "सरल"? यह हमारी विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रांतिकारियों के योगदान को हम तक पहुंचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियां, पत्नी के गहने यहां तक कि स्वयं की जान भी दांव पर लगा दी,उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालांकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयं परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रांतिकारियों पर इसलिए लिखता हूं ताकि आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍ "जीवित-शहीद" की उपाधि से अलंक्रत श्रीकृष्ण  "सरल"  सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण  "सरल"  का जन्म १ जनवरी १९१९ को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पांच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारंभ कर दिया था। प्रारंभ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रांतिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रांतिकारियों के जीवन को खंगालने के उद्देश्य से की। १५ महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से १२५ पुस्तकें,४५ काव्य-ग्रंथ,४ खंड काव्य,३१ काव्य संकलन,८ उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण  "सरल"  तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहां? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएंगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दांव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है।
वे कहते हैं- "पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
                  फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

-हेमंत रिछारिया