गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

जय हो नर्मदा मैया...


वाह रे वाह मेरे भैया, जय हो नर्मदा मैया...
खोद दिया नगर सारा नर्मदाजल के नाम पर,
जनता को हैं लूट रहे थोथे विकास के काम पर।
पहले ही क्या माँ रेवा का आँचल साफ़-स्वच्छ रहा है!
शहर के गन्दे नालों का पानी निर्बाध उसमें बहा है।
अब वही दूषित जल जनता को पिलाओगे
हाय! नर्मदाजल घर के शौचालयों में डलवाओगे
माँ रेवा की खोह तो आज तक ना भरने पाई
रेत खोदने लेकिन तट पर मशीनें चलवाईं
इस पर भी अच्छे दिनों का दे रहे झूठा दिलासा
भ्रष्टाचार हुआ कितना बाद में होगा खुलासा
विकास हेतु निरीह जनों के सिर पर कर चढ़ा है
रातों-रात झट से देखो सम्पत्ति-कर बढ़ा है
कौन जाने विकास या विनाश की ये परिभाषा
जनता समझ ना पाती है राजनीति की भाषा
बस निवेदन है इतना चैन से जन को रहने दो
माँ रेवा का जल उसके अंक में कलकल बहने दो
शिखर चढ़ी धूल भी क्षण भर को तो इठलाती है
पवन के इक झोंके से लेकिन धूलधूसरित हो जाती है
फिर लोकतन्त्र में "दिनकर" की कविता पुन: दुहराती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

’अप्पा सो परमप्पा‌’


आज बुद्ध और महावीर के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई। बुद्ध और महावीर दोनों ही ने परमात्मा को इनकार कर दिया था। महावीर ने तो यहाँ तक कहा कि -"अप्पा सो परमप्पा" अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। वहीं बुद्ध का प्रसिद्ध वचन है -"अप्प दीपो भव:" अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। बौद्ध और जैन दोनों ही दर्शनों में आत्मा के ऊपर किसी आकाशीय परमात्मा स्वीकार नहीं है। मेरे देखे यह उचित ही है। हमारे सनातन धर्म में आत्मा के ऊपर परमात्मा को स्वीकार किया गया है। इसका आशय यह नहीं कि बुद्ध और महावीर परमात्म तत्व से अपरिचित थे, नहीं.. कदापि नहीं, वे भलीभाँति परिचित थे किन्तु उन्होंने जनमानस को आत्मा पर ही रोके रखा क्योंकि वे जानते थे कि जो आत्मा को जानने में सक्षम हो गया वह परमात्मा से साक्षात्कार कर ही लेगा। यदि आत्मा को जाने बिना परमात्मा को समझने का प्रयास किया तो वह झूठ होगा। वर्तमान में हमारे कई तथाकथित साधु-सन्तों द्वारा अपने निजी स्वार्थ व लाभ के लिए परमात्मा के नाम पर झूठ को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया गया है। आखिर ये कैसे सम्भव है कि देश में धर्मगुरूओं व धार्मिक आयोजनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे और समाज आध्यात्मिक रूप से कँगाल होता रहे? इस समस्या का मुख्य कारण है परमात्मा के नाम पर फ़ैलाया गया झूठ और फ़रेब। जब तक असल प्रचलन में है तभी तक नकल की सँभावना होती है जब असल ही विदा हो जाता है तो समाज में नकल का कोई स्थान नहीं रहता। ये हमने अभी कुछ ही वर्षों पूर्व "विमुद्रीकरण" (नोटबन्दी) के रूप देख लिया है। बुद्ध और महावीर ने यही किया था, मनुष्य से उसका आकाशीय परमात्मा छीन कर उसे उसी के अन्दर प्रतिष्ठित आत्मा पर ला खड़ा किया था। क्योंकि जब परमात्मा से ही इनकार कर दिया जावेगा तो कोई व्यक्ति, बाबा या सन्त अपने परमात्मा होने का दावा करेगा कैसे! स्वर्ग-नर्क की बात तो फ़िर बेमानी ही समझिए, जिसके नाम पर लोगों को डराया या प्रलोभन दिया जाता है। यहाँ मुझे स्मरण आता है प्रबुद्ध महिला सन्त राबिया का जो सदैव अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी का पात्र रखती थी और पूछने पर कहती थी कि "मैं मशाल से स्वर्ग में आग लगा दूँगी और नर्क को पानी में डुबो दूँगी। आशय बहुत स्पष्ट है कि स्वर्ग-नर्क, परमात्मा के नाम पर जो खेल चल रहा है उसे समाप्त करना ही सच्चे सन्त का लक्षण है। जो धर्मगुरू धर्म के नाम पर झूठ के इस जाल को काटने के स्थान पर और अधिक बुनता है उसे धर्मगुरू या उपदेशक कहना सर्वथा अनुचित है। जब तक ऐसे तथाकथित धर्मगुरू व उपदेशक समाज में रहेंगे तब तक आम आदमी का इस प्रकार के फ़र्जी बाबाओं के चँगुल से मुक्त हो पाना मुश्किल है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया


रविवार, 17 दिसंबर 2017

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा आपका भाग्य..!


अंग्रेजी नववर्ष 2018 आने वाला है। नववर्ष के आगमन के हर्ष के साथ सभी को उत्सुकता है कि उनके लिए यह नववर्ष कैसा रहेगा? समाचार-पत्रों, न्यूज़ चैनलों इत्यादि पर ज्योतिषाचार्यों, टैरोकार्ड रीडर, अंक ज्योतिषियों की आपका भविष्य बताने वाली गणनाएँ प्रसारित हो रही हैं। जिनकी राशि या मूलाँक में शुभफ़ल बताया जा रहा है वे प्रफ़ुल्लित हैं वहीं अशुभ फ़ल वाले जातक मायूस हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से आपके भविष्य में कोई बड़ा परिवर्तन या बदलाव नहीं आता है। आप जिसे वर्षफ़ल समझ रहे है वह केवल "गोचर" गणना है। जो प्रतिमाह परिवर्तित होती है। कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने के अवसर पर "वर्षफ़ल" के नाम पर जातक के पूरे वर्ष का फ़लित बताना उचित नहीं है क्योंकि गोचर आधारित गणनाएँ प्रतिमाह परिवर्तित होती रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र में "गोचर" का महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन जातक का भविष्यफ़ल बताने में इसकी गणनाओं को 10 से 15 फ़ीसदी ही मूल्य दिया जाता है। फ़िर वर्षफ़ल क्या होता है? सही मायने में "वर्षफ़ल" आपके प्रत्येक जन्मदिन से परिवर्तित होता है ना कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से। इसमें आपके नवीन वर्ष की "वर्ष-कुण्डली" बनाकर आपका वर्षफ़ल बताया जाता है। किसी जातक का भविष्यफ़ल बताने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक उसकी जन्मपत्रिका के मुख्य व महत्त्वपूर्ण शुभाशुभ योग, ग्रहस्थिति, विंशोत्तरी दशाएँ, योगिनी दशाएँ, गोचर, और अन्त में उस जातक का वर्षफ़ल होते हैं। वर्षफ़ल में "मुँथा" एवं "मुँथेश" का विशेष महत्त्व होता है। "मुँथा" एवं "मुँथेश" की स्थिति का जातक के वर्षफ़ल में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

मुँथा का निर्धारण- 

जातक की जन्मलग्न सँख्या में उसकी वर्तमान आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उस राशि की "मुँथा" होती है। "मुँथा" राशि के स्वामी ग्रह को "मुँथेश" कहते हैं।

मुँथा की स्थिति-

यदि जातक की वर्षकुण्डली में "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 4.6.८.12 स्थानों में स्थित हो एवं पाप ग्रहों से दृष्ट हो जातक को उस वर्ष कष्ट एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वहीं यदि "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 2.3.9.12 में हो तो यह शुभ होती है। जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम् राशि का वर्षलग्न अशुभ होता है।
"वर्षफ़ल" का विषय अत्यन्त वृहद् व विस्तृत है। हमने यहाँ वास्तविक वर्षफ़ल का परिचय कराने के उद्देश्य मात्र से उपर्युक्त सँक्षिप्त जानकारी आप पाठकों को दी है। अत: यदि कैलेण्डर के वर्षफ़ल बदलने पर किसी भविष्यवक्ता की गणना आपके पक्ष में नहीं है या आपकी राशि के लिए उसका फ़ल अशुभ है तो चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारा विश्वास है कि अब आप "वर्षफ़ल" के विषय में भलीभाति जान गए होंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astrpoint_hbd@yahoo.com

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

क्या कहते हैं राहुल गाँधी के सितारे


18 दिसम्बर को गुजरात व हिमाचल प्रदेश के चुनावी परिणाम आने वाले हैं। इन परिणामों का असर इन चुनावों में भाग लेने वाले प्रत्याशियों व दलों के अतिरिक्त एक और खास व्यक्ति पर पड़ेगा वह है काँग्रेस के नव-नियुक्त अध्यक्ष राहुल गाँधी। आईए ज्योतिष की दृष्टि से जानने का प्रयास करते हैं कि आने वाला समय राहुल गाँधी के लिए कैसा रहेगा। राहुल गाँधी की कुण्डली मकर लग्न की है जिसके अधिपति शनि हैं। शनि सत्ता का कारक होता है। राहुल गाँधी की जन्मपत्रिका शनि लग्नेश होने के कारण अति-महत्त्वपूर्ण ग्रह है। राहुल गाँधी की राशि वृश्चिक है जिसके अधिपति मँगल हैं। राहुल गाँधी की जन्मपत्रिका में शनि केन्द्र में नीचराशिस्थ होकर विराजमान है जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने जीवन में अतिशय सँघर्ष व परिश्रम के बाद भी अपेक्षित सफ़लता प्राप्त नहीं होती है। यहाँ शनि की उच्च दृष्टि कर्मक्षेत्र पर है जो कि शुभ है। इस योग के कारण राहुल गाँधी अधीनस्थ के स्थान पर नेतृत्व में सफ़ल होते नज़र आ रहे हैं। राहुल गाँधी की कुण्डली कर्मक्षेत्र का कारक शुक्र शत्रुक्षेत्री है। इसके परिणामस्वरूप उन्हें सत्ता प्राप्ति में अवरोध व विलम्ब होगा। अथक परिश्रम के बाद भी वे अपेक्षित सफ़लता से दूर रहेंगे वहीं सप्तम स्थान में अकेला शुक्र व नीचराशिस्थ सप्तमेश उन्हें दाम्पत्य सुख से वँचित कर रहा है। चतुर्थेश मँगल छठे भावगत होने के कारण उन्हें जनमानस में लोकप्रियता से वँचित कर रहा है। दिवीय स्थान में राहु उन्हें पारिवारिक सुख प्राप्त करने एवं श्रेष्ठ वक्ता बनने में बाधक है। सप्तमेश के नीचराशिगत होने के कारण उन्हें साझेदारी एवं गठबन्धन से लाभ नहीं होगा। वर्तमान में राहुल गाँधी चन्द्र की महादशा व लग्नेश की अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं। इसके अतिरिक्त वे शनि की साढ़ेसाती के अन्तिम चरण को भोग रहे हैं शनि लग्नेश होने के कारण शुभ हैं। जुलाई 2017 से राहुल गाँधी लग्नेश शनि की अन्तर्दशा के प्रभाव में है यह दशा उनके लिए शुभ है जिसके चलते वे संगठन के उच्चतम पद पर आसीन हुए हैं। भले ही हाल के चुनावों में वे सत्ता से दूर रहेंगे किन्तु आने वाले दो वर्षों में उनका राजनीतिक भविष्य एक सकारात्मक मोड़ लेता प्रतीत हो रहा है। आने वाले दिनों में उनके नेतृत्व में काँग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की ओर अग्रसर होती नज़र आ रही है लेकिन सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें अभी लम्बा सँघर्ष एवं प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
भारत

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

मुख्यमंत्री की यात्राएँ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिन्हें प्रदेशवासी प्यार से ’मामा’ कहते हैं, उनका चुनावी तैयारी का अँदाज़ ही निराला है। वे चुनावी यात्रा निकालने में बड़े माहिर है और मजे की बात यह कि वे इस प्रकार की यात्राएँ धर्म के नाम पर करते हैं। पहले "नर्मदा सेवायात्रा" और अब "एकात्म यात्रा"। इन यात्राओं का उद्देश्य वैसे तो धार्मिक बताया जाता है लेकिन असल में ये होतीं चुनावी यात्राएँ ही हैं। इन यात्राओं के प्रचार-प्रसार में करोड़ों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं केवल यह जानने के लिए कि हवा का रुख़ किस तरफ़ है। ’मामा’ आप निश्चिंत रहिए जब तक मध्यप्रदेश में किसी ’मौसा’ (सशक्त विपक्ष) का आगमन नहीं होता तब तक आप मज़े से "मेरी मर्ज़ी...." वाली तर्ज पर राज कीजिए। क्योंकि आपको सत्ता के सिंहासन उतारने के लिए मुद्दों की नहीं एक ’मौसा’ की अर्थात् सशक्त विपक्षी नेतृत्व की आवश्यकता है। मुद्दे तो वैसे ही प्रदेश में भरे पड़े हैं। आपसे रेत का अवैध उत्खनन रुक नहीं रहा, कोई नया उद्योग लग नहीं रहा, मेट्रो प्रोजेक्ट लगाने वाली कम्पनी ’ज़ायका’ ने अपने ऋण की सुरक्षा ना पाकर इस प्रोजेक्ट से अपने पैर वापस खींच लिए। किसानों में नाराजगी व्याप्त है, भले किसानों पर गोली चलवा कर आप आँदोलन को दबाने में सफ़ल हो गए हों। टीकाकरण में हमारा प्रदेश बहुत पीछे है। महिलाओं के साथ हुए अपराध में मध्यप्रदेश अव्वल है। सरप्लस बिजली उत्पादन के बावजूद हमारा प्रदेश सबसे महँगी बिजली दर वाले प्रदेशों से में से एक है। ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसे कई मुद्दे हैं जो आपके माथे पर बल डालने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन जनता विवश है उसके पास ’मामा’ के रुप में आप तो हैं लेकिन विकल्प के रूप में कोई ’मौसा’ नहीं हैं अर्थात् शक्तिशाली विपक्ष। मेरे देखे विवशता और विकल्प के अभाव में होने वाली विजयश्री खोखली व हल्की होती है। जब इसी आधार पर विजयश्री की निरन्तर पुनरावृत्ति होती है तब एक दिन क्रान्ति होती है और लोकतन्त्र में स्वर गूँजता है "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..."। इससे पहले कि ये स्वर हमारे प्रदेश में गुँजायमान हो, आत्ममँथन कीजिए और अपनी कमियों में सुधार कर प्रदेश के वास्तविक विकास में सँलग्न हो जाईए। जिस दिन आप विकास के आधार पर विजयश्री प्राप्त करेंगे उसी दिन आप सही मायनों में सफ़ल माने जाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 27 नवंबर 2017

शुभ..मंगल..सावधान


हमारे षोडश सँस्कारों में "विवाह" एक अति महत्त्वपूर्ण व मुख्य सँस्कार माना गया है। क्या आप जानते हैं कि विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय किन दोषों का गँभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है? यदि नहीं, तो आईए आज हम आपको बताते हैं कि विवाह मुहूर्त्त निकालते समय किन प्रमुख दोषों का त्याग करना चाहिए।

"लत्तादोष"-

विवाह का दिन निर्धारण करते समय "लत्तादोष" का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। "लत्तादोष" का निर्धारण नक्षत्र एवं ग्रहों की स्थिति से होता है। जैसा कि "लत्ता" नाम से स्पष्ट इसका आशय ग्रहों की लात से होता है। सूर्य जिस नक्षत्र पर होता है उससे आगे के बारहवें नक्षत्र पर, मंगल तीसरे पर, शनि आठवें पर एवं गुरू छठवें नक्षत्र पर लात मारता है। ठीक इसी प्रकार कुछ ग्रह अपने से पिछले नक्षत्र पर लात मारते हैं जैसे बुध सातवें, राहु नौवें, चन्द्र बाईसवें, शुक्र पांचवे नक्षत्र पर लात मारता है। राहु वक्री होने के कारण इसकी गणना अगले नक्षत्र को मानकर ही की जाती है। "लत्तादोष" में विवाह के नक्षत्र से गणना कर नक्षत्रों में स्थित ग्रहों का विवेचन कर उनकी "लत्ता" का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी ग्रहों की "लत्ता" को अशुभ माना जाता है किन्तु कुछ विद्वान केवल पाप व क्रूर ग्रहों की "लत्ता" को ही त्याज़्य मानते हैं। अत: विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय "लत्तादोष" का विवेचन अवश्य करें।

"वेध" दोष-

विवाह में "वेध दोष" को सर्वत्र वर्जित माना गया है। यदि विवाह मुहूर्त्त वाले दिन "वेध दोष" हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। "वेध दोष" का निर्धारण में पंचांग में दिए "पंचशलाका" व "सप्तशलाका" चक्र का परीक्षण कर होता है। विवाह के अतिरिक्त "वेध दोष" को वरण एवं वधूप्रवेश के लिए भी त्याज्य माना गया है। शास्त्रानुसार एक रेखा में आने वाले नक्षत्रों का परस्पर वेध माना गया है। विवाह नक्षत्र का जिस भी नक्षत्र के साथ "वेध" हो यदि उस नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो इसे "वेध-दोष" माना जाएगा। जैसे पंचांग में दिए सप्तशलाका चक्र में "रेवती" नक्षत्र का "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र के साथ वेध है। अब यदि विवाह का नक्षत्र "रेवती" है तो "वेध दोष" निवारण के लिए "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए, यदि उत्तरा-फ़ाल्गुनी नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हुआ तो यह "वेधदोष" माना जाएगा। विवाह में यह दोष सर्वत्र विचारणीय व त्याज्य है।

"जामित्र दोष"-

ज्योतिष शास्त्र में सप्तम भाव से दाम्पत्य सुख एवं जीवनसाथी का विचार किया जाता है। इसे "जाया" भाव या "जामित्र" भाव कहा जाता है। इस भाव से सम्बन्धित दोष को "जाया दोष" या "जामित्र" दोष कहते हैं। "जामित्र" दोष में विवाह करना सर्वथा घातक होता है। इसके फ़लस्वरूप भावी दम्पत्ति दाम्पत्य सुख से वंचित रह सकते हैं। विवाह मुहूर्त्त में लग्न का निर्धारण करते समय यदि चन्द्र लग्न या लग्न से सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह; चाहे वह पूर्ण चन्द्र ही क्यों ना हो, स्थित हो तो इसे "जामित्र" दोष कहा जाता है। इस दोष विवाह में करना घातक होता है। अत: विवाह लग्न का निर्धारण करते समय "जामित्र" दोष का परीक्षण कर इसे त्यागना उचित व हितकर रहता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 18 नवंबर 2017

’पद्मावती" का रण


किरीतार्जुन शास्त्र का एक वाक्य है- "यद्यपि शुद्धम् लोकविरूद्धम् ना करणीयम् ना आचरणीयम्" अर्थात् यदि कोई बात सत्य व शुद्ध भी हो लेकिन समाज के विरुद्ध हो तो उसे व्यवहार में नहीं लाना चाहिए। इन दिनों संजय लीला भंसाली की फ़िल्म को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। राजपूत समाज, राजपरिवार व करणी सेना सहित कई क्षत्रिय संगठन इस फ़िल्म का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। क्षत्रिय संगठनों का उनका आरोप है कि भंसाली ने उनके इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है वहीं फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली इस बात से साफ़ इनकार कर रहे हैं। बहरहाल, ताज़ा जानकारी के अनुसार सेंसर बोर्ड ने भंसाली का आवेदन अधूरा होने के कारण फ़िल्म को वापस लौटा दिया है। सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली के अनुसार अब फ़िल्म को जनवरी 2018 में प्रमाण-पत्र मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म "पद्मावती" अब जनवरी 2018 में ही रिलीज़ हो पाएगी। फ़िल्म रिलीज़ होगी भी या नहीं यह सेंसर बोर्ड को तय करना है लेकिन इससे पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म "पद्मावती" को बनाने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्योंकि कुछ पत्रकार व विद्वान बार-बार कह रहे हैं कि जौहर का महिमामण्डन नहीं होना चाहिए। जहाँ तक रानी "पद्ममिनी" की प्रसिद्धि का प्रश्न है तो उनकी प्रसिद्धि ही जौहर (वीरतापूर्वक आत्मबलिदान) के कारण है फ़िर तो भंसाली स्वयं जौहर का महिमामण्डन कर रहे हैं। फ़िल्म कोई नवीन ऐतिहासिक जानकारी भी प्रदान नहीं करती। रानी "पद्ममिनी" की कहानी सभी को पता है। वहीं फ़िल्म (जैसा कि ट्रेलर देखकर लगा) रानी "पद्ममिनी" की गरिमा को कम अवश्य करती नज़र आ रही है। इस फ़िल्म को लेकर देश के साथ-साथ बालीवुड भी दो धड़ों में बँटा नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग विरोध। इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्ममिनी का कोई दृश्य नहीं है। यह बात भले ही सत्य हो लेकिन जैसा फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया जा रहा है उसे देखकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई समाज या स्वयं इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपने पूर्वजों का प्रणय-दृश्य देखना पसन्द करेंगे? नहीं ना...। कोई भी सभ्य व्यक्ति या समाज अपने आराध्य व मान्य पूर्वजों का "प्रणय-दृश्य" देखना पसन्द नहीं करेगा। अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्ममिनी के दृश्यों की बात बहुत दूर की है। जहाँ तक राजपरिवारों की गरिमा व मर्यादा की बात है तो "पद्ममिनी" का अभिनय करने वाली अभिनेत्री के राजा रतनसिंह का चरित्र निभाने वाले अभिनेता के साथ दिखाए गए "प्रणय-दृश्य" भी आपत्तिजनक है। यदि भंसाली की नीयत इतनी ही साफ़ थी तो उन्होंने सेंसर बोर्ड को दिए अपने आवेदन-पत्र में फ़िल्म के "ऐतिहासिक या काल्पनिक" वाला स्थान (कालम) रिक्त क्यों छोड़ा? वे इस फ़िल्म को एक "काल्पनिक" फ़िल्म बताकर विवाद समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब आप किसी के पूर्वजों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उनकी सहमति आवश्यक है। क्योंकि आप इतिहास से छेड़छाड़ करने के अधिकारी नहीं हैं फ़िर चाहे वह इतिहास किसी देश का हो या किसी राजपरिवार का। मेरे देखे अब समय आ गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के लिए सेंसर बोर्ड के अन्तर्गत उप-समीतियाँ गठित होनी चाहिए। जैसे इतिहासकारों की समीति, धर्मगुरूओं की समीति...क्योंकि इन मुद्दों पर आधारित फ़िल्मों की पटकथा को परखने के लिए इन क्षेत्रों के विद्वानों की राय व अनुशंसा महत्त्वपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

पिता की पाती


मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम,
मेरे घर की शान मेरी मुस्कान हो तुम,
मेरा मान हो; सम्मान हो तुम,
तुम हो प्राणवायु मेरी,
मेरे सारे अरमान हो तुम।
तुम मरी पहचान हो,
मेरे लिए वरदान हो तुम,
भगवान का अहसान है
मेरे घर विराजमान हो तुम,
तुम सदा हँसती रहो
सदा सुखी रहो,
मेरा सारा जहान हो तुम।
मेरी आयु तुम्हें मिल जाए
मेरे लिए भगवान हो तुम,
मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम॥

- तेजमोहन पटेल, होशंगाबाद (म.प्र.)
(सहा. पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी)

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

नेताजी का कमरा


कोलकाता के एल्गिंन रोड स्थित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के घर का वह कमरा जिससे उन्होंने 16-17 जनवरी 1941 की मध्यरात्रि "महानिष्क्रमण" किया था।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

चाहत

तुम मुझसे बात न करो
और मैं तुमसे मिल न पाऊँ
इसकी रत्ती भर शिकायत नहीं मुझे
लेकिन, कम से कम इतना तो चाहती हूँ
कि तुम्हारी गँध इन हवाओं में बरकरार रहे,
तुम्हारा स्पर्श यूँ ही छूता रहे,
फ़ूलों, दरख़्तों, छायाओं, लहरों पर।
तुम्हारी मन्द मुस्कान और आँखों की नमी,
चाँद-तारों सी टँकी रहे आसमान पर,
तुम्हारी थिरकती उँगलियों से
उठती हुई ताल बजती रहे,
मेरे आस-पास।
तुम्हारा गीत गूँजता रहे दिशाओं में,
बस...इतना ही तो चाहती हूँ मैं।

-रोज़लीन, करनाल (हरियाणा)

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...


जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पँख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,
स्वयँ धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

तुमको दीप जलाना होगा

चहुँओर अँधियारा है
दिनकर भी थक हारा है
लेकिन मेरी देहरी पर
उजियारे को लाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

तन्हाई का डेरा है
दु:ख ने किया बसेरा है
इस भीषण दावानल में
अपना हाथ बढ़ाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

बहुत दूर किनारा है
प्रतिकूल नदी की धारा है
भँवर में फँसी नैया की
अब पतवार चलाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा....

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया




हमारा सौरमण्डल


चन्द्रमा -
1. चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। चन्द्रमा हमारे सौरमण्डल का पाँचवा सबसे बड़ा उपग्रह है।
2. चन्द्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं है बल्कि यह सूर्य से पड़ने वाली रोशनी के कारण चमकता है।
3. चन्द्रमा पृथ्वी से 4 गुना छोटा है।
4. चन्द्रमा का गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफ़ी कम है।
5. खगोलशास्त्रियों के अनुसार चन्द्रमा पृथ्वी का ही एक हिस्सा है जो करोड़ों वर्षों पर पूर्व एक
    उल्का पिण्ड के पृथ्वी  से टकराने के कारण टूट कर अलग हो गया था।
6. पृथ्वी पर जिस वस्तु का वज़न 10 किग्रा है चन्द्रमा पर उसका वज़न मात्र 1.5 किग्रा होगा।
7. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल एक हिस्सा ही दिखाई देता है। दूसरा हिस्सा पृथ्वी से कभी नहीं दिखेगा।
8. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल 59 फ़ीसदी हिस्सा ही दिखाई देता है। चन्द्रमा का 41 फ़ीसदी हिस्सा केवल अंतरिक्ष में जाकर ही देखा जा सकता है।
9. चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 27 दिन 7 घण्टे का समय लगाता है एवं ठीक इतने ही समय में वह अपनी धुरी पर एक बार घूम जाता है।

मंगल ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से 10 गुना छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 22 करोड़ 79 लाख किमी है।
3. मंगल ग्रह पर एक साल 687 दिन का होता है।
4. यह ठोस ग्रह है।
5. इसके दो चन्द्रमा हैं।
6. मंगल ग्रह का सबसे बड़ा पर्वत ओलम्पस माउण्ट हमारे एवरेस्ट पर्वत से 3 गुना बड़ा है।
7. यदि आपका वज़न 100 किलो है तो मंगल पर आपका वज़न सिर्फ़ 37 किलो होगा क्योंकि मंगल पर गुरुत्वाकर्षण बल बेहद कम है।

बुध ग्रह-
1. इसकी सूर्य से दूरी 5.5 करोड़ किमी है।
2. यह सूर्य की परिक्रमा 1.5 दिन में पूरी कर लेता है।
3. यह सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है।

गुरू ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 78 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह अपनी धुरी पर घूमने वाला सबसे तेज ग्रह है। यह 9 घण्टे 55 मिनिट में अपनी धुरी का 1 चक्कर लगा लेता है।
4. यह गैसीय ग्रह है।
5. इस ग्रह का एक चन्द्रमा है।

शुक्र ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से आँशिक छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 11 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह सौरमण्डल के नर्क के समान है क्योंकि यहाँ  सल्फ़्यूरिक एसिड के बादल हैं जिनसे तेजाब की बारिश होती रहती है।
4. यह सबसे गर्म ग्रह है। इसका अधिकतम तापमान 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
5. इस ग्रह का कोई चन्द्रमा नहीं है।
6. यह सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ सूर्य पश्चिम से निकलकर पूर्व में अस्त होता है।
7. शुक्र ग्रह का एक साल 224 दिनों का होता है।
8. जब यह पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 26करोड़ किमी होती है और जब यह पृथ्वी से सर्वाधिक दूर होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 160 करोड़ किमी होती है।

शनि ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 700 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी 142 करोड़ किलोमीटर है।
3. शनि ग्रह पर 1800 किमी. प्रतिघण्टे की रफ़्तार से हवाएँ चलती हैं।
4. शनि ग्रह के 62 उपग्रह हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए


इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो और तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें विजयादशमी की पूजा वाले दिन हमारे प्रधानसेवक मोदी जी को टिश्यू पेपर को अपने जेब में रखते हुए दिखाया जा रहा है। मोदी भक्त इसे उनकी महानता का प्रतीक बताकर सोशल मीडिया पर खूब साझा कर रहे हैं। सही भी है करना भी चाहिए; महानता भी है जो स्वच्छता का इतना ख्याल रखा गया लेकिन इसी कार्यक्रम इन्हीं प्रधानसेवक ने जूते पहनकर जब राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा व आरती की उसे क्या कहिएगा? केवल प्रधानसेवक मोदी ने ही नहीं अपितु राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सहित सभी अतिथियों ने जूते पहनकर ही राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा अर्चना की थी। मेरा इस बात को इस मंच पर रखने का आशय बस इतना ही है भक्ति अपनी जगह ठीक है लेकिन अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए, जो इन दिनों कुछ लोग प्रधानसेवक की करने में लगे हुए हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 30 सितंबर 2017

विसर्जन का महत्त्व



आज देवी-विसर्जन के साथ ही नौ दिनों से चले आ रहे शारदीय नवरात्र समाप्त जाएँगे। हमारी सनातन परम्परा में विसर्जन का विशेष महत्त्व है। विसर्जन अर्थात् पूर्णता, फ़िर चाहे वह जीवन की हो, साधना की हो या प्रकृति की। जिस दिन कोई वस्तु पूर्ण हो जाती है उसका विसर्जन अवश्यंभावी हो जाता है। आध्यात्मिक जगत् में विसर्जन समाप्ति की निशानी नहीं अपितु पूर्णता का सँकेत है। देवी-विसर्जन के पीछे भी यही गूढ़ उद्देश्य निहित है। हम शारदीय नवरात्र के प्रारम्भ होते ही देवी की प्रतिमा बनाते हैं, उसे वस्त्र-अलँकारों से सजाते हैं। नौ दिन तक उसी प्रतिमा की पूर्ण श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और फ़िर एक दिन उसी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। विसर्जन का यह साहस केवल हमारे सनातन धर्म में ही दिखाई देता है क्योंकि सनातन धर्म इस तथ्य से परिचित है कि आकार तो केवल प्रारम्भ है और पूर्णता सदैव निराकार होती है। यहाँ निराकार से आशय आकारविहीन होना नहीं अपितु सम्रगरूपेण आकार का होना है। निराकार अर्थात् जगत के सारे आकार उसी परामात्मा के हैं। मेरे देखे निराकार से आशय है किसी एक आकार पर अटके बिना समग्ररूपेण आकारों की प्रतीती। जब साधना की पूर्णता होती है तब साधक आकार-कर्मकाण्ड इत्यादि से परे हो जाता है। तभी तो बुद्धपुरूषों ने कहा है "छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना मिलाय के...।" नवरात्र के यह नौ दिन इसी बात की ओर सँकेत हैं कि हमें अपनी साधना में किसी एक आकार पर रूकना या अटकना नहीं है अपितु साधना की पूर्णता करते हुए हमारे आराध्य आकार को भी विसर्जित कर निराकार की उपलब्धि करना है। जब इस प्रकार निराकार की प्राप्ति साधक कर लेता है तब उसे सृष्टि के प्रत्येक आकार में उसी एक के दर्शन होते हैं जिसे आप चाहे तो परमात्मा कहें या फ़िर कोई और नाम दें, नामों से उसके होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। साधना की ऐसी स्थिति में उपनिषद् का यह सूत्र अनुभूत होने लगता है-"सर्व खल्विदं ब्रह्म" और यही परमात्मा का एकमात्र सत्य है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

मन रूपी रावण का दहन हो


आज विजयादशमी है। असत्य पर सत्य की; बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। विजयादशमी के ही दिन मर्यादा पुरूषोत्तम् भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी दिन को स्मरण करने लिए प्रतिवर्ष हम विजयादशमी का उत्सव मनाते हैं जिसमें रावण के पुतले का दहन किया जाता है। रावण के पुतले के दहन के साथ हम यह कल्पना करते हैं कि आज सत्य की असत्य पर जीत हो गई और अच्छाई ने बुराई को समाप्त कर दिया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है! सनातन धर्म की यह परम्पराएँ केवल आँख मूँद कर इनकी पुनुरुक्ति करने के लिए नहीं हैं। बल्कि यह परम्पराएँ तो हमें इनके पीछे छिपे गूढ़ उद्देश्यों को स्मरण रखने एवं उनका अनुपालन करने के लिए बनाई गई हैं। आज हम ऐसी अनेक सनातनधर्मी परम्पराओं का पालन तो करते हैं किन्तु उनके पीछे छिपी देशना एवं शिक्षा को विस्मृत कर देते हैं। हमारे द्वारा इन सनातनी परम्पराओं का अनुपालन बिल्कुल यन्त्रवत् होता है। विजयादशमी भी ऐसी एक परम्परा है। जिसमें रावण का पुतला दहन किया जाता है। रावण प्रतीक है अहँकार का; रावण प्रतीक है अनैतिकता का; रावण प्रतीक है सामर्थ्य के दुरुपयोग का एवं इन सबसे कहीं अधिक रावण प्रतीक है- ईश्वर से विमुख होने का।  रावण के दस सिर प्रतीक हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अवगुणों के। रावण इन सारे अवगुणों के मिश्रित स्वरूप का नाम है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकाण्ड विद्वान था। किन्तु उसकी यह विद्वत्ता भी उसके स्वयं के अन्दर स्थित अवगुण रूपी रावण का वध नहीं कर पाई। तब वह ईश्वर अर्थात् प्रभु श्रीराम के सम्मुख आया। मानसकार ने ईश्वर के बारे में कहा है-"सन्मुख होय जीव मोहि जबहिं। जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं॥ इसका आशय है जब जीव मेरे अर्थात् ईश्वर के सम्मुख हो जाता है तब मैं उसके जन्मों-जन्मों के पापों का नाश कर देता हूँ। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है यह पूर्ण सत्य। हमारी इस पञ्चमहाभूतों से निर्मित देह में मन रूपी रावण विराजमान है। इस मन रूपी रावण के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना,भ्रष्टाचार, अनैतिकता इत्यादि दस सिर हैं। यह मन रूपी रावण भी ईश्वर से विमुख है। जब इस मन रूपी रावण का एक सिर कटता है तो तत्काल उसके स्थान पर दूसरा सिर निर्मित हो जाता है। ठीक इसी प्रकार हमारी भी एक वासना समाप्त होते ही तत्क्षण दूसरी वासना तैयार हो जाती है। हमारे मन रूपी रावण के वध हेतु हमें भी राम अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना ही होगा। जब हम ईश्वर के सम्मुख होंगे तभी हमारे इस मनरूपी रूपी रावण का वध होगा। विजयादशमी हमें इसी सँकल्प के स्मरण कराने का दिन है। आईए हम प्रार्थना करें कि प्रभु श्रीराम हमारे मन स्थित रावण का वध कर हमें अपने श्रीचरणों में स्थान दें। जिस दिन यह होगा उसी दिन हमारे लिए विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा।
 
-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

दुर्गा महोत्सव 2017-


बुधवार, 27 सितंबर 2017

सुरक्षा श्रेणी



1.    SPG :  Special Protection Group Gaurds.


2.      Z+ :  Security cover of 55 Personal.
                 Including [10+ Commando]
                 +[ Police  Personnel ]

3.     Z   :  Security cover of 22 Personal.
                Including [4 or 5 NSG Commando]
                +[ Police  Personnel ]

4.    Y :   Security cover of 11 Personal.
               Including [1 or 2 Commando]
              +[ Police  Personnel ]


5.    X  :  Security cover of 5 or 2 Personal.
              [ NO Commando ]
              [Only Armed Police Personnel ]    


(source: wikipedia)   

रविवार, 24 सितंबर 2017

काम उर्जा का उर्ध्वगमन हो, दमन नहीं


विगत कुछ वर्षों से जितने भी फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे गए हैं उनमें से अधिकाँश पर यौन शोषण के आरोप हैं। धर्म-जगत् से जुड़े व्यक्तियों पर यौन शोषण व बलात्कार जैसे आरोप यह सिद्ध करते हैं कि हमने ब्रह्मचर्य की गलत परिभाषा गढ़ रखी है। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य से आशय काम-शक्ति के उर्ध्वगमन से है, ना कि काम-शक्ति के दमन से। ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते समय अधिकाँश तथाकथित धर्मोपदेशक काम उर्जा के दमन की सीख देते नज़र आते हैं। हमें यह समझना होगा कि काम एक उर्जा है जिसका किसी भी परिस्थिति में दमन नहीं किया जा सकता। इस उर्जा के सदुपयोग का एकमात्र उपाय इसका सम्यक् रूपान्तरण ही है। काम उर्जा का केवल उर्ध्वगमन ही किया जा सकता है अन्यथा उसका बहिर्गमन सुनिश्चित है, जो स्वाभाविक है। किन्तु जब हम इस उर्जा के स्वाभाविक बहिर्गमन को रोक कर इसका दमन करते हैं तब यह उर्जा विकृत होती है और एक दिन इस दमित उर्जा का विस्फ़ोट हो जाता है। काम उर्जा का यह विस्फ़ोट सामाजिक अराजकता का मुख्य कारण है। वर्तमान समय में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। इसके पीछे वैसे तो कई कारण है लेकिन सबसे अहम् कारण यौन शिक्षा का अभाव एवं काम उर्जा का दमन है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि हम अमर्यादित काम उर्जा के निर्गमन को मान्यता दें, नहीं; कदापि नहीं। वर्तमान समय में तो काम उर्जा के रूपान्तरण एवं उर्ध्वगमन की महती आवश्यकता है क्योंकि आज आध्यात्मिक जगत् भी इस दमित काम उर्जा के विस्फोट के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर हमारे सनातन धर्म पर पड़ रहा है। आज कुछ अपराधियों के कारण समूचे सन्त समाज व साधकों को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। धर्म-जगत् से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों के आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त होने के कारण आज धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं में श्रद्धा एवं विश्वास कम हो रहा है। यदि समय रहते धर्म-जगत् का यह प्रदूषण समाप्त नहीं किया गया तो भविष्य में इसके दुष्प्रभावों को रोकना असम्भव हो जाएगा। आज आवश्यकता है ऐसे सन्तों की जो एक देशना की भान्ति समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। जिनका समूचा जीवन ही एक उपदेश हो। जो ध्यान-धारणा-समाधि से सुपरिचित हों और अपने अनुयायियों व साधकों को भी इन साधनाओं में अग्रसर करने में सक्षम हों। वर्तमान समय में जब सूचना-क्रान्ति के चलते मोबाईल एवं इंटरनेट जैसे साधनों से सभी प्रकार की बातें सहज सुलभ हैं, ध्यान एवं भक्ति ही वे दो मार्ग हैं जिनसे अमर्यादित कामोपभोग जैसी दुष्प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है। ध्यान और भक्ति के आधार पर ही हम इस प्रकृति-प्रदत्त काम उर्जा का सम्यक् उपयोग करने में सफल हो सकते हैं। अत: काम उर्जा का दमन नहीं वरन् उर्ध्वगमन करने का प्रयास करें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
 
"किल्पर टाइम्स" रायपुर (छग) में प्रकाशित हमारा लेख


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अप्प दीपो भव:




लोग खुश हैं कि एक फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे पहुँच गया। लेकिन जब तक हम धर्म के नाम पर रुढ़ और अन्धभक्त बने रहेंगे तब ऐसे बाबा पैदा होते रहेंगे। दरअसल, हम धर्म और शास्त्रों के नाम पर इतने भीरू होते हैं कि हमें इनका नाम लेकर कोई भी बरगला सकता है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। इस बात को सदैव स्मरण रखें कि आपके और परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। फ़िर आप कहेंगे कि गुरू का क्या महत्त्व? मेरे देखे गुरू का महत्त्व बस इतना ही है कि वह आपको यह समझा दे कि आपके और आपके परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं, स्वयं उसकी भी नहीं। वास्तविक गुरू अपने शिष्य को हर अटकाव; हर बाधा से मुक्त करता है जो उसे परमात्मा तक पहुँचने में आती है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं- "अप्प दीपो भव:।" जब ऐसे गुरू जीवन में होंगे तभी बुद्धत्व घटित होगा अन्यथा बुद्धू तो लोग बन ही रहे हैं, धर्म के नाम पर।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 17 सितंबर 2017

एम्बुलेंस दादा : करीमुल-हक

राष्ट्रपति से पद्म श्री प्राप्त करते हुए करीमुल-हक
एम्बुलेंस दादा..! जी हाँ यही पहचान उत्तर-भारत के चाय बागान में काम करने वाले करीमुल-हक की। जिन्हें स्थानीय क्षेत्र के लोग एम्बुलेंस दादा के रूप में पहचानते हैं। करीमुल-हक अपनी मोटरसाईकिल रूपी एम्बुलेंस से बीमार लोगों को अस्पताल पहुँचाते हैं। वर्ष 1993 में अपनी बीमार माँ को अस्पताल पहुँचाने के लिए उन्हें एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई और समय पर चिकित्सा सुविधा ना मिलने के कारण उनकी माँ ने घर पर ही दम तोड़ दिया। इस हादसे ने करीमुल-हक तो बेहद दु:खी किया। वे अन्दर ही अन्दर घुटन महसूस करने लगे। तभी एक दिन उनके साथ चाय बागान में काम करने वाले उनके सहयोगी को चोट लगी और उन्हें अस्पताल ले जानी की आवश्यकता महसूस हुई लेकिन एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई। तभी करीमुल-हक ने अपने सहयोगी को उठाकर मोटरसाईकिल पर बिठाया और उसे अपनी पीठ से बाँधकर अस्पताल पहुँचा दिया। उसी दिन से करीमुल-हक ने यह ठान लिया कि वे मोटरसाईकिल को ही एम्बुलेंस के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए उन्होंने कर्ज़ लेकर एक मोटरसाईकिल खरीदी। करीमुल-हक आसपास के लगभग बीस गाँवों में अपनी नि:शुल्क बाईक-एम्बुलेंस सुविधा प्रदान करते हैं। करीमुल-हक जहाँ रहते हैं उस जगह से निकटतम अस्पताल लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है। करीमुल-हक अब तक लगभग 5000 से अधिक ज़रूरतमन्द लोगों को अपनी बाईक-एम्बुलेंस से अस्पताल पहुँचा चुके हैं। उनकी इस समाजसेवा के लिए उन्हें कई सम्मान व पुरूस्कारों के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा "पद्म श्री" से भी सम्मानित किया जा चुका है।
एम्बुलेंस दादा की बाईक-एम्बुलेंस




बुधवार, 6 सितंबर 2017

पहाड़-पुरूष

         "माउण्टेनमेन" दशरथ माँझी
 हौंसला यदि बुलन्द हो तो पहाड़ भी आपका रास्ता नहीं रोक सकता। इस बात को चरितार्थ करने वाले पहाड़-पुरूष अर्थात् "माउण्टेनमेन" का नाम है- दशरथ माँझी। दशरथ माँझी का जन्म सन 1934 में हुआ। बचपन में ही वे घर से भाग कर धनबाद की कोयला खदानों में काम करने लगे। शादीयोग्य आयु हो जाने पर उनका विवाह फगुनी देवी से हुआ। एक दिन पहाड़ से फ़िसलने के कारण उनकी उनकी पत्नी गँभीर रूप से घायल हो गईं। इलाज के लिए शहर जाना अपेक्षित था किन्तु पहाड़ के कारण शहर का मार्ग अत्यधिक लम्बा था। इसी के चलते समय पर चिकित्सा ना मिल पाने के कारण दशरथ माँझी की पत्नी फगुनी का निधन हो गया। अपनी पत्नी की इस प्रकार हुई मृत्यु ने दशरथ माँझी को विचलित कर दिया। उन्होंने अपने गाँव और शहर के मध्य खड़े विशालकाय पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने की ठान ली जिससे गाँव के लोगों को किसी भी आपात स्थिति में शहर पहुँचने में देर ना हो। उन्होंने अकेले ही छैनी-हथौड़े से पहाड़ को काटना शुरू कर दिया। प्रारम्भ में गाँववालों ने उनके इस दुष्कर कार्य का मज़ाक उड़ाया लेकिन माँझी के दृढ़ सँकल्प के आगे वे मौन हो गए। अन्तत: 22 (1960-1983) वर्षों की अनवरत कठोर साधना के पश्चात दशरथ माँझी ने गहलौर गाँव के समीप स्थित पहाड़ को काटकर 110 मीटर लम्बे और लगभग 9 मीटर चौड़े मार्ग का निर्माण कर दिया। उनके इस प्रयास से गया जिले के अतरी और वजीरगंज क्षेत्रों के बीच की दूरी लगभग 40 कि.मी तक कम हो गई। उनकी इस उपलब्धि के उन्हें आज "माउण्टेनमेन" के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2006 में बिहार से सरकार ने उनका नाम पद्मश्री पुरुस्कार के लिए प्रस्तावित किया। 26 दिसम्बर 2016  को "बिहार की हस्तियाँ नामक श्रृँखला में इंडिया पोस्ट द्वारा उनके नाम पर एक डाक टिकट जारी किया गया। कैंसर की बीमारी के कारण 17 अगस्त 2007 को 73 वर्ष की आयु में "माउण्टेनमेन" श्री दशरथ माँझी का निधन हो गया।

दशरथ माँझी द्वारा निर्मित मार्ग

                                



शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

एक सेनानी का संघर्ष

श्री गौर हरिदास जी अपनी धर्मपत्नि के साथ
न्याय व सम्मान यदि उचित समय पर ना मिलें तो वे अपना मूल्य खो देते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हज़ारों उदाहरण मौजूद हैं जिनमें देरी से मिले न्याय व सम्मान ने अपना मूल्य खो दिया। अपनी गौरवपूर्ण पहचान व सम्मान को प्राप्त करने के लिए किए ऐसे ही एक सँघर्ष का नाम है- स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी श्री गौर हरिदास। जिन्हें स्वयं को स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी साबित करने में तीस वर्ष से भी अधिक का समय लगा। श्री गौर हरिदास जी ने स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए सन् 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें हमारे आजाद देश की लचर व्यवस्थाओं के चलते 33 वर्षों बाद सन् 2009 में प्राप्त हुआ। 85 वर्षीय श्री गौर हरिदास पाँच वर्षों तक स्वतन्त्रता आन्दोलन का हिस्सा रहे थे। वानर सेना के सदस्य के रूप में वे छिपकर स्वतन्त्रता सँग्राम से सम्बन्धित साहित्य और सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। सन् 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झण्डा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। ओडिशा में पैदा हुए श्री गौर हरिदास तेरह भाई-बहनों में दूसरी सन्तान थे। उनके पिता गाँधीवादी थे और अपने पिता से ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। श्री गौर हरिदास जी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लम्बे समय तक कार्य किया। श्री गौर हरिदास जी का सँघर्ष तब शुरू हुआ जब उन्हें अपने पुत्र को एक सँस्थान में प्रवेश दिलाने के लिए स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता महसूस हुई। स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए श्री गौर हरिदास जी ने आवेदन दिया जो उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यालयों व मन्त्रालय के चक्कर लगाने के उपरान्त 33 वर्षों बाद प्राप्त हुआ। उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के आधार पर उस सँस्थान में प्रवेश मिल गया लेकिन श्री गौर हरिदास जी का जीवन अपनी गौरवपूर्ण पहचान पाने के लिए एक लम्बे सँघर्ष में बदल गया। एक ऐसा सँघर्ष जिसमें ना कोई धरना-प्रदर्शन था; ना ही कोई नारा था; यदि था, तो बस श्री गौर हरिदास जी के हाथों में अपनी फ़ाईलों का एक बण्डल जिसे लेकर वह अत्यन्त शान्तिपूर्ण ढँग से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वर्षानुवर्ष भटकते रहे। सम्मान से कहीं अधिक यह स्वयं की पहचान की लड़ाई थी। वर्ष 2009 में स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के साथ श्री गौर हरिदास जी के सँघर्ष को तो विराम लग गया लेकिन इस सँघर्ष ने उनसे उनके जीवन के कई अनमोल पल छीन लिए जो उन्हें अब कभी प्राप्त नहीं होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
  सम्पादक

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"


सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।


जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली
जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली


जनता? हाँ, लम्बी-बड़ी जीभ की वही कसम
जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है
सो ठीक, मगर आख़िर इस पर जनमत क्या है?
है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?


मानो जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं
जब चाहो तभी लो उतार सजा लो दोनों में
अथवा कोई दुधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में


लेकिन होता भूडोल, बवँडर उठते हैं
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है


हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है
जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है।


अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजेय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं


सबसे विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो


आरती के लिए तू किसे ढूँढता है मूरख
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में


फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर"

 

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

पत्रकारिता या बाज़ार !

आज तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की ख़बर देखने के लिए जब टी.वी. चालू किया तो मन अत्यन्त विषाद से भर गया। ये मीडिया समूह जो देश की हर घटना पर न्यायाधीश की तरह व्यवहार करते और यदा-कदा अपने चैनलों पर नैतिकता की बातें करते हैं क्या सारी नैतिकता अन्य व्यक्तियों के लिए हैं स्वयं उनके लिए नैतिकता का कोई मापदण्ड नहीं है? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि आज तीन तलाक से जुड़ी खबरें दिखाते वक्त लगभग हर न्यूज़ चैनल केवल एक लाईन बोलकर ब्रेक ले रहा था। क्या यही नैतिकता तकाज़ा है कि जब देशवासी इतनी अहम ख़बर को देखने के लिए अपना बहुमूल्य समय निकालकर न्यूज़ चैनल देख रहे हैं आप सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लाईन बोलकर उन्हें लम्बे-लम्बे विज्ञापन दिखाए चले जा रहे हैं। मीडिया समूहों की आर्थिक विवशता मैं समझ सकता हूँ लेकिन उसके लिए पूरा दिन पड़ा है, कभी-कभी तो देशभक्ति व राष्ट्रवाद का पाठ दूसरों को पढ़ाने के स्थान पर स्वयं भी पढ़ लिया करें। आज के दौर में दूरदर्शन को छोड़कर एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ज़रा करीने से ख़बरें प्रसारित करता हो। पत्रकारिता का तमाशा बनाकर रख दिया है, और कैमरे के सामने तेवर देखिए; माईक आडी हाथ में लेते ही बन बैठे निर्णायक, ना प्रश्न पूछने का सलीका, ना बहस-मुबाहिसे की तमीज़। आम आदमी करे भी तो क्या करे वह भी तो इसी मीडिया से आकर्षित है, लेकिन कभी-कभी बड़ी कोफ़्त होती है इस प्रकार की पत्रकारिता से। यदि कुछ पत्रकारों व चैनलों को छोड़ दिया जाए तो यह पत्रकारिता के पतन का दौर है। मैं इस प्रकार की पत्रकारिता की निन्दा व भर्त्सना करता हूँ। यही कर सकता हूँ  और क्या....टी.वी. बन्द कर सकता था सो कर दिया और बैठ गया सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मैकाले इस देश की आजादी का पिता है- ओशो

- स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति-

इस देश में में क्रांति न होती अगर मैकाले न हुआ होता। लोग कहते हैं कि मैकाले ने इस देश को गुलाम बनाया और मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि मैकाले ही इस देश की आजादी का पिता है। अगर अंग्रेजों ने कोशिश न की होती शिक्षा देने की इस देश के लोगों को,यहां कभी क्रांति न होती । क्योंकि क्रांति आई शिक्षित लोगों से, अशिक्षित लोगों से नहीं, पंडित-पुरोहितों से नहीं, वेद के, उपनिषदों के ज्ञाताओं से नहीं–जो लोग पश्चिम से शिक्षा लेकर लौटे, जो वहां का थोड़ा रस लेकर लौटे। सुभाष ने लिखा है कि जब मैं पहली दफा यूरोप पहुंचा और एक अंग्रेज चमार ने मेरे जूतों पर पालिश किया तो मेरे आनंद का ठिकाना न रहा। अब जिसने अपने जूतों पर अंग्रेज को पालिश करते देखा हो, वह वापिस आकर इस देश में अंग्रेज के जूतों पर पालिश करे, यह संभव नहीं। अब मुश्किल खड़ी हुई। मैकाले इस देश की आजादी का पिता है। उसी ने उपद्रव खड़ा करवाया। अगर मैकाले इस देश के लोगों को अंग्रेजी शिक्षा न देता,पढ़ने देता उन्हें संस्कृत मजे से और पाठशालाओं में रटने देता उनको गायत्री,कोई हर्जा होने वाला नहीं था। वे अपना जनेऊ लटकाये, अपनी घंटियां बजाते हुए शांति से अपने भजन-कीर्तन में लगे रहते। उसने लोगों को पश्चिम में जो स्वतंत्रता फली है उसका स्वाद दिलवा दिया। एक दफा स्वाद मिल गया, फिर अड़चन हो गई। अभी तुम देखते हो, ईरान में क्या हो रहा है? ईरान के सम्राट को जो परेशानी झेलनी पड़ रही है वह उसके खुद ही के कारण। ईरान अकेला मुसलमान देश है जहां शिक्षा का ठीक से व्यापक विस्तार हुआ है और ईरान के शहंशाह ने शिक्षा पर बड़ा जोर दिया। ईरान समृद्ध है, शिक्षित है–सारे मुसलमान देशों में! और यही नुकसान की बात हो गई। अब वे ही शिक्षित लोग और समृद्ध लोग अब चुप नहीं रहना चाहते; अब वे कहते हैं, हमें हक भी दो, अब हमें प्रजातंत्र चाहिए; अब हम राज्य करें, इसका भी हमें मौका दो। और कोई मुसलमान देश में उपद्रव नहीं हो रहा है, क्योंकि लोग इतने गरीब हैं, इतने अशिक्षित हैं, मान ही नहीं सकते, सोच ही नहीं सकते कि हमें और राज्य की सत्ता मिल सकेगी, असंभव! असंभव को कौन चाहता है? जब संभव दिखाई पड़ने लगती है कोई बात, जब हाथ के करीब दिखाई पड़ने लगती है कि थोड़ी मेहनत करूं तो मिल सकती है, तब उपद्रव शुरू होता है। इस देश में शूद्र हजारों साल से परेशान हैं, कोई बगावत नहीं उठी। उठ नहीं सकती थी। अंबेदकर जैसे व्यक्ति में बगावत उठी, क्योंकि शिक्षा का मौका अंग्रेजों से मिला।

- आचार्य रजनीश "ओशो"

सोमवार, 14 अगस्त 2017

आजादी की ख़बर



व्रत या अनशन

जन्माष्टमी कब मनाई जाए इसे लेकर पण्डितों में शीत युद्ध जारी है। विद्वत्तजन धर्मग्रन्थों को खँगाल-खँगालकर अपने-अपने मतों के समर्थन में प्रमाण जुटा रहे हैं। सभी व्रतों के नियम और तिथियों के निर्धारण में ग्रन्थों के माध्यम से प्रमाण स्वरूप अत्यंत क्लिष्ट सँस्कृत के श्लोक इत्यादि प्रस्तुत कर रहे हैं। ठीक भी है, अधिकांश कर्मकाण्डी विद्वानों से और कोई आशा की भी नहीं जा सकती क्योंकि रट्टू तोते की तरह धर्मग्रन्थों को रटना और रटते-रटते बिना समझे अर्थ का अनर्थ करना उनकी आदत है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। जन्माष्टमी व्रत के सम्बन्ध में ये तथाकथित विद्वान बार-बार व्रत के नियम इत्यादि बता रहे हैं लेकिन क्या यह जानते भी हैं कि व्रत कहते किसे हैं? मेरा इन सभी महानुभावों से कहना है कि केवल भूखे रहने और अन्न ना खाने को व्रत नहीं कहते, यह तो अनशन हुआ। व्रत तो उसे कहते हैं कि जब आप परमात्मा के प्रेम में इस भाँति निमग्न हों कि आपको खाने-पीने की सुध ही भूल जाए, सच्चे अर्थों में व्रत यही है। अब इस प्रकार के प्रेमासिक्त व्रत में तिथि कहाँ बाधक है? भला प्रेम करने के लिए भी कोई नियम या रीति होती है? बाबा पलटूदास कहते हैं- "लगन मुहूरत झूठ सब, और बिगाड़े काम। पलटू शुभ-दिन; शुभ-घड़ी याद पड़ै जब नाम॥" इस प्रकार का हार्दिक व्रत किसी भी दिन किया जाए सफ़ल होता है। वहीं बलात् व दमनपूर्वक भूखा रहने के लिए खूब मुहूर्त्त इत्यादि साध भी लिया जाए तो व्यर्थ है। अत: मेरा सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है कि वे परमात्म प्रीति का भाव साधैं, मुहूर्त्त इत्यादि के फ़ेर में ना उलझें। मुहूर्त्त सधे तो ठीक, ना सधे तो भी ठीक। एक शायर ने क्या खूब कहा है-" सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर। जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर॥
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
राधे-राधे
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

रविवार, 13 अगस्त 2017

आजाद भारत की प्रथम मुद्रा

एक लाख का नोट-1
एक लाख का नोट-2
एक हजार का नोट
सौ रु. का नोट-1
सौ रु. का नोट-2
दस रु. का नोट
पाँच रु. का नोट

आजादी का सच

क्या आप जानते हैं भारत को स्वतन्त्रता कब प्राप्त हुई? आप कहेंगे- "हाँ", 15 अगस्त 1947 को। यदि मैं कहूँ कि आपका जवाब गलत है, तो आप चौंक जाएँगे। लेकिन इतिहास बताता है भारत की आजादी का शँखनाद 30 दिसम्बर सन 1943 को अण्डमान-निकोबार से हो गया था। 30 दिसम्बर सन 1943 के ही दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम आजादी की घोषणा करते हुए तिरंगा फ़हराया था। यह भारत की आज़ादी का शँखनाद था। विडम्बना है कि काँग्रेसी शासन ने विद्वेषता के चलते इस अति-महत्त्वपूर्ण तथ्य को नज़रअंदाज़ किया।
विश्व  ज्ञानकोश भी इस बात की पुष्टि करता है-
"21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया।"

-(साभार: विश्व ज्ञानकोश)