रविवार, 30 अप्रैल 2017

अर्ज़ किया है...


 (1.)   "ज़रा आँखें तो तरेरिए ममत्व के लिए,
         सिंह की दहाड़ सिर्फ़ हिन्दुत्व के लिए?"
       
(2.)  "मेरी तकरीर ना कौम की हिफ़ाज़त के लिए है,
        ये सियासी बातें तो फ़कत सियासत के लिए हैं"

(3.)   "मुफ़लिसों के लहू की जाने कैसी ये प्यास है,
         मौत के सौदागरों को जन्नत की तलाश है।"  

(4.)  "मैं परेशां हूं हमने आधा कश्मीर हारा क्यों
        लोग परेशां है कटप्पा ने बाहुबली मारा क्यों"

(5)   "ये कोई सियासी भूल सा लगता है
         वो संग फ़ेके तो फ़ूल सा लगता है"

(6)   "मन्दिर-मस्ज़िद पे सियासत उन्हें चमकानी है
        हमें तो साहब अपने चूल्हे की आग जलानी है"

(7)   "शाह-औ-मुफ़लिस का फ़र्क कैसे मिटता
        ए कज़ा तूने सब बराबर कर दिया"

(8)    "दिल पे लगी हर चोट बुरी होती है
         मन्न्तों बाद कोई गोद हरी होती है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

"ध्यान" है आध्यात्मिक सेल्फ़ी

वर्तमान समय में स्वदर्शन अर्थात "सेल्फ़ी" लेने का बड़ा फ़ैशन है। युवाओं से लेकर बुज़ुर्गों व महिलाओं तक पर इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है। मुझे इस प्रकार के "सेल्फ़ी" चलन से लगा कि "सेल्फ़ी" का प्रचलन तो हमारे देश में; हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदियों से है किन्तु इस रूप में नहीं, मेरे देखे आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" "ध्यान" है। जिसमें आप वास्तविक व प्रामाणिक रूप में अपना "आत्मदर्शन" करते हैं। उसमें आपका शरीर ही आपका उपकरण अर्थात डिवाइस होता है और जब वह "सेल्फ़ी" ली जाती है तो उसे किसी भी मंच पर साझा नहीं करना पड़ता वह तो स्वयमेव प्रत्येक व्यक्ति को दिखाई देने लगती है किन्तु उस प्रकार की "सेल्फ़ी" आज की "सेल्फ़ी" की तरह कुछ पलों में नहीं ली जा सकती उसके लिए तो धैर्य व शान्ति के साथ निर्विचार होकर अपने शरीर रूपी मोबाईल को अनुकूलित अर्थात "कस्टमाईज़" करना पड़ता है। आज की "सेल्फ़ी" तो बस शरीर का ही प्रतिबिम्ब हैं किन्तु "ध्यान" रूपी सेल्फ़ी में वह दिखाई देता है, जो है, जिसे शास्त्रों में कहा गया है "एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति" या फ़िर "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" अर्थात "चैतन्य"। आईए प्रयास करें कि हम कभी आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" लेने में सक्षम हो सकें क्योंकि आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" कभी नष्ट नहीं होती शेष सारी "सेल्फ़ी" शरीर रूपी मोबाईल के फ़ार्मेट होते ही "डीलिट" हो जाती हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म हो

अभी-अभी मोदी सरकार ने वीआईपी कल्चर को ख़त्म करने का आगाज़ करते हुए सभी वीवीआईपी वाहनों से लाल बत्ती हटाने का फ़ैसला लिया। यह एक स्वागत योग्य कदम है लेकिन इतने भर से काम चलने वाला नहीं हमें वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म करनी होगी। इस देश में जहां अदना सा सरपंच या मण्डल अध्यक्ष अपना पद छोड़ने के बाद भी पूर्व सरपंच या पूर्व मण्डल अध्यक्ष लिखता  है वहां केवल वाहनों पर से लाल बत्ती हटाने से काम नहीं चलेगा। इस देश में वीवीआईपी मानसिकता को ख़त्म करने की पहल होनी चाहिए। यह पहल केवल सरकार नहीं कर सकती सरकार ने तो जो कदम उठाना था वह उठा ही लिया है लेकिन इसमें आम जनता को भी सहयोग करना होगा। आख़िर कौन वे लोग हैं जो इन आम से नेताओं को ख़ास बना देते हैं? ये हम और आप ही हैं जो नेताओं को अपने ख़ास होने का अहसास व आभास कराते हैं। आपने देखा होगा कोई राजनेता या अभिनेता कहीं दिख जाए उसके चरण-चुम्बन व सेल्फ़ी लेने की होड़ सी लग जाती है। उसके आस-पास कई लोग स्वयं ही उसके सुरक्षाकर्मियों की भूमिका अदा करने लग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा दो कारणों से होता है पहला तो इसलिए होता है कि हम उस प्रतिष्ठित व्यक्ति को आधार बनाकर अपना अहंकार तुष्ट करना चाहते हैं, दूसरा हम उस नेता की नज़र में उसके ख़ास बनना चाहते हैं जिससे हमारे दैनिक जीवन के समस्त नैतिक-अनैतिक कार्यों में बाधा ना पड़े। वाहनों पर लगी लाल बत्ती को त्वरित हटाना सम्भव था, जो कर दिया गया है लेकिन हमारे समाज में व्याप्त इस "अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्ति संस्कृति" (वीवीआईपी कल्चर) को हटाना शायद इतना आसान ना होगा। समाज में फ़ैली इस कुव्यवस्था को तभी हटाया जा सकता है जब आम नागरिक अपने स्वार्थ पर अंकुश लगा कर राष्ट्रहित के बारे सोचें। इस दिशा में हुई एक सकारात्मक पहल का हमें स्वागत करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सन्त राबिया ने की थी कुरान में तरमीम

इन दिनों देश में "तीन तलाक" के मुद्दे को लेकर काफ़ी गहमागहमी है। न्यूज़ चैनल पर आए दिन इस मुद्दे को लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहते हैं। ऐसी एक बहस देखकर बड़ी हैरानी हुई कि कुछ लोग धर्म को लेकर किस हद तक कट्टर हो जाते हैं और मानवता रूपी अपने सबसे बड़े धर्म से विमुख हो जाते हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम धर्मगुरू व मुस्लिम समाज दो भागों में बँटा नज़र आ रहा है। तीन तलाक के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों से देश की अधिकांश जनता जो कि मुस्लिम नहीं भी है, पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। मेरे देखे शास्त्र यदि ठीक से ना समझा जाए तो वह शस्त्र से भी अधिक ख़तरनाक व हानिकारक सिद्ध हो सकता है यह इसका ज्वलंत उदाहरण है, इसीलिए हमारे सनातन धर्म में तो एक समय तक शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार भी हर किसी को प्राप्त नहीं था, इस निषेध के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही था कि शास्त्र का अध्ययन केवल वही व्यक्ति करे जो उसे भलीभाँति समझ सकता हो। जहाँ तक बात है कुरान की तो कई इस्लाम के जानकारों के अनुसार कुरान में तीन तलाक के इस रूप का कोई ज़िक्र नहीं है। यहाँ मैं मुस्लिम सन्त राबिया का ज़िक्र करना चाहूँगा जिन्होंने कुरान में भी तरमीम करने का साहस दिखाया था। राबिया अपने ज़माने की एक बहुत ऊँचे दर्जे की मुस्लिम सन्त हुई हैं। एक बार एक मुस्लिम फ़कीर हसन उनके यहाँ मेहमान था उसने जब इबादत के वक्त कुरान को पढ़ा तो उसमें एक वाक्य कटा हुआ पाया उसने सोचा कि कुरान में तो तरमीम (संशोधन) हो ही नहीं सकती, यह तो गुनाहे-अज़ीम (सबसे बड़ा अपराध) है। जब उसने राबिया से इस बारे में पूछा तो राबिया ने कहा कि यह तरमीम उसने खुद की है। हसन ने पूछा कि राबिया कुरान में आख़िर ऐसा क्या लिखा है जो तेरे जैसी सन्त को इसमें तरमीम करना पड़ी? इस पर राबिया ने उत्तर देते हुए कहा कि "कुरान का वचन है शैतान को घृणा करो और हसन जबसे मुझे इलहाम (ईश्वरानुभूति) हुआ है तबसे मुझे किसी में भी शैतान नज़र नहीं आता बस खुदा ही खुदा नज़र आता है तो मैं घृणा किससे करूं इसलिए मैंने कुरान के इस वाक्य को काट दिया।" कितनी खूबसूरत व श्रेष्ठ बात सन्त राबिया ने कही अगर यही बात आज के मौलाना समझ लें तो सारा मसला ही हल हो जाए। मैं सदैव कहता हूँ कि धर्म एक व्यवस्था मात्र है जो समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए बनाई गई है। अत: जो नियम, जो रीति-रिवाज़, जो बात समाज को अव्यवस्थित करे वो धर्म से सम्बन्धित नहीं हो सकती, चाहे वह किसी पंथ की हो, चाहे किसी ग्रंथ की हो। तीन तलाक जैसे नियमों को जितनी जल्दी हो सके विदा दे दी जानी चाहिए।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

रविवार, 9 अप्रैल 2017

सुरक्षाकर्मियों का अपमान करना निन्दनीय

अभी कुछ दिन पहले न्यूज़ चैनल पर एक ख़बर देखी फ़िर उसका वीडियो भी "वायरल" हो गया। इस वीडियो में म.प्र. के मुखिया अपने सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए "गेट-आउट" कहते नज़र आ रहे हैं। उन सुरक्षाकर्मियों का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक बीजेपी कार्यकर्ता को सीएम के पास जाने रोका था जिस पर इस छुटभैये नेता ने वबाल मचा दिया और घटना का राजनीतिकरण करते हुए अपने आपको एक जाति विशेष का होने के कारण इस प्रकार का दुर्व्यवहार होने की बात कहकर हंगामा कर दिया जिस पर मुख्यमंत्री जी ने अपने ही सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए बाहर निकल जाने का निर्देश दे डाला। यह पूरी घटना मुझे आहत कर गई। आखिर ये राजनेता अपने वोट बैंक के लिए संवेदनाओं को किस प्रकार ताक पर रख दिया करते हैं यह इस बात का जीवन्त उदाहरण है। मेरे देखे किसी भी वीआईपी या वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही उन महत्त्वपूर्ण व अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा करना होता है। अपने इस कर्त्तव्य को निभाते हुए कभी-कभार किसी व्यक्ति के साथ थोड़ी धक्का-मुक्की हो जाती है लेकिन यह तभी होता है जब वह व्यक्ति अनाधिकार चेष्टा कर रहा होता है। सुरक्षाकर्मियों का कार्य एक बेहद दुष्कर कार्य है। ये सुरक्षाकर्मी अपनी घंटों की थका देने वाली ड्यूटी में शायद ही आपको कभी शान्ति से बैठे नज़र आते हों। सदैव तत्परता के साथ खड़े रहना; हमेशा चौकस रहना; स्वयं जनसमूह के धक्के खाकर अपने नेता को आरामदायक व सुरक्षित स्थिति-परिस्थिति प्रदान करते ये सुरक्षाकर्मी धन्यवाद के पात्र होते हैं इस प्रकार अपमान के नहीं, खासकर वह भी तब; जब वे अपना कर्त्तव्य पूरी मुस्तैदी से निभा रहे हों। यदि ये सुरक्षाकर्मी किसी गरीब व असहाय व्यक्ति को जो अपनी समस्या से सीएम को अवगत कराना चाहता हो, धकेल कर दूर करते और सीएम साहब इन पर भड़कते तो शायद हमें इतना दु:ख ना भी होता किन्तु केवल अपनी पार्टी एक कार्यकर्ता को दूर करने पर सीएम का इस प्रकार अपने सुरक्षाकर्मियों का सार्वजनिक रूप से अपमान करना बेहद निन्दनीय है। यदि इस प्रकार ये सुरक्षाकर्मी पार्टी कार्यकर्ताओं व भीड़ की सुविधा के अनुसार कार्य करने लगें और कोई दुर्घटना हो जाए तब भी सारा दोष इन्हीं सुरक्षाकर्मियों को दिया जाएगा, शायद इन्हें तत्काल प्रभाव से निलम्बित या बर्खास्त भी कर दिया जाए। यहां मुझे पूर्व राष्ट्रपति स्व. श्री ए पी जे अब्दुल कलाम साहब का स्मरण आ रहा है जिन्होंने अपनी सुरक्षा में लगे एक सुरक्षाकर्मी को देर तक खड़े देखकर अपने निज सहायक को कहा था कि "वह कब तक खड़ा रहेगा उसे बैठने को कहो" और जब वह सुरक्षाकर्मी नहीं माना तब गंतव्य पर पहुंचकर सबसे पहले कलाम साहब ने अपने उस सुरक्षाकर्मी को अपने कमरे में बुलाकर उसे "धन्यवाद" कहा और पूछ-"मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं।" क्या कलाम साहब के अतिरिक्त कभी आपने ऐसा वाकया सुना है; क्या कभी किसी भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने अपनी सुरक्षा में लगे इन सुरक्षाकर्मियों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की है, या उन्हें धन्यवाद कहा है? हां वोट बैंक के लिए सार्वजनिक रूप उनके अपमान कि किस्से अवश्य सुनाई दे जाते हैं। जिस कार्यकर्ता के तथाकथित दुर्व्यवहार को लेकर सीएम अपने सुरक्षाकर्मियों पर इतने नाराज़ हो गए क्या उस कार्यकर्ता को अपने नेता की सुरक्षा का अन्दाज़ा नहीं था, क्या उसे उनकी सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य पता नहीं था? फ़िर क्यों उस कार्यकर्ता ने अनाधिकार चेष्टा की क्योंकि यदि वह सीएम साहब का इतना खा़स होता तो वे स्वयं उसे देखते ही अपने पास बुला लेते! किन्तु इस प्रकार सीएम या मन्त्री के पास जाकर सेल्फ़ी लेना और फ़ोटो खिंचाना इन छुटभैए नेताओं की आदत में शुमार होता है फ़िर इसी के आधार पर वे स्थानीय अधिकारियों पर यदा-कदा धौंस जमाते नज़र आते है। हमारे सुरक्षाप्राप्त नेताओं को ये सदैव स्मरण होना चाहिए कि सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करना होता है जिसमें भीड़ से सुरक्षा भी शामिल है। यदि इन नेताओं को जनता से मेल-मिलाप इतना प्रीतिकर है तो फ़िर सुरक्षा लेते ही क्यों है? वहां तो स्टेटस सिम्बल व प्रतिष्ठा आड़े आ जाती है। ज़रा किसी नेता की सुरक्षा की समीक्षा या उनकी सुरक्षा में कटौती की बात क्या होती है, उस नेता के द्वारा हंगामा बरपा दिया जाता है। इस प्रकार  "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" वाली कहावत चरितार्थ कर आप जनता को अधिक देर तक मूर्ख़ नहीं बना सकते क्योंकि वास्तविकता कभी न कभी सामने आ ही जाती है। मैं म.प्र. के मुख्यमन्त्री के द्वारा अपने सुरक्षाकर्मियों के सार्वजनिक रूप से अपमान की इस घटना की कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

रघुवीर यादव: एक संजीदा कलाकार

फ़िल्म अभिनेता रघुवीर यादव

आज "मुंगेरीलाल के हसीन सपने", "मेसी साब", "लगान", "चाचा चौधरी" और "पीपली लाइव" जैसी फ़िल्मों व सीरीयल के सुप्रसिद्ध कलाकार श्री रघुवीर यादव जी भेंट करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। एक बेहद संजीदा व सरल व्यक्तित्व के धनी श्री रघुवीर यादव अपनी असल ज़िंदगी में भी उतने सरल व संजीदा हैं जितने वे अपनी फ़िल्मों में अक्सर दिखाई देते हैं। बिना किसी बहुत बड़े ताम-झाम और "बाऊंसरों" से विहीन एक बेहद सरल इंसान के रूप में वे आज मुझसे मिले। आज दिन में तीन बार उनसे मिलने और बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और हर बार वे अपनी शूटिंग के व्यस्त कार्यक्रम से थके होने बावजूद अत्यंत विनम्र व उत्साहपूर्वक मुझसे मिले। मैंने अपनी पत्रिका "सरल-चेतना" उन्हें भेंट कर पत्रिका के बारे में उन्हें जानकारी दी जिससे वे अत्यंत प्रभावित हुए। मैंने सदैव कहा है; आज पुन: इसी बात को दोहराता हूं कि ईश्वर जिसी ह्रदय से अपना आशीर्वाद प्रदान करता है वह उसे सादगी व सरलता प्रदान करता है जैसे उसने श्री रघुवीर यादव को सरलता व सादगी प्रदान की। ऐसे महान व संजीदा कलाकार का नगर में आगमन व उनसे मिलना निश्चय ही मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
"संपादक: सरल-चेतना"

खूबसूरती


सूखे पेड़ की भी अपनी खूबसूरती होती है। आज दोपहर जैसे ही एक सूखे पेड़ पर निगाह पड़ी तो पाया कि सूखा पेड़ भी कितना सुन्दर हो सकता है। खूबसूरती फ़ूलों की मोहताज नहीं, ये आज समझ आया। ऐसे नए-नए सबक सिखाने के लिए ज़िंन्दगी तेरा शुक्रिया।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"सन्देह" श्रद्धा की पहली सीढ़ी है-

मेरे देखे अज्ञान मनुष्य को उतना नहीं भटकाता जितना उधार ज्ञान भटका देता है। आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है जिसमें एक युवती एक तथाकथित कथावाचक से कुछ सार्थक प्रश्न करती नज़र आ रही है और वे तथाकथित कथावाचक उसके प्रश्नों के सटीक उत्तर देने के स्थान पर "लकीर के फ़कीर" वाली कहावत चरितार्थ करते प्रतीत हो रहे हैं। इस वीडियो को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह कान्वेंट में अपने बच्चों को पढ़ाने का परिणाम है। हम इस वीडियो को इस ढंग से प्रचारित करने से कतई सहमत नहीं हैं। आज एक युवती के सार्थक प्रश्न पर एक तथाकथित कथावाचक की पोल खुल गई। इस युवती के प्रश्न का सही उत्तर देने के स्थान पर प्राचीन रुढ़ियों की आड़ लेकर अपने अज्ञान का प्रदर्शन कर इस कथावाचक ने समाज को जिस प्रकार दिग्भ्रमित किया वह घोर निन्दनीय है। ये तथाकथित कथावाचक भागवत कथा करने के लिए लाखों रु. दक्षिणा के रुप में लेते हैं और रुकने के लिए इन्हें "एसी कमरा" आवश्यक होता है। ये शुभ है कि आज इस युवती ने एक स्वस्थ परम्परा की शुरुआत की। मेरी समझ नहीं आता हम प्रश्नों से इतना भागते क्यों हैं? प्रश्नों का तो समाधान होना चाहिए, सन्देह श्रद्धा की पहली सीढ़ी है चाहे वह जगज्जननी पार्वती का हो या युगपुरुष विवेकानन्द का। लेकिन हमारे ये उधार ज्ञान के धनी पोंगा पण्डितजन सिर्फ़ एकालाप जानते हैं, संवाद नहीं इसलिए आज का समाव व युवा धर्म से विमुख हैं क्योंकि उसके सन्देहों का उचित समाधान नहीं होता अपितु उसे सन्देह के स्थान पर धर्म के नाम पर मौन रहना सिखाया जाता है। मेरे देखे इन कथावाचकों की भी क्या गलती? इन्हें खुद ही प्रश्नों के उत्तर नहीं पता तो ये समाज व जनमानस को क्या उत्तर देंगे। ये तो तोतारंटत जानते हैं, श्रद्दालुओं को नचाना जानते हैं। यदि इन्हें प्रश्नों के उत्तर पता होते तो आज इस समाज का स्वरूप कुछ और ही होता। शुभ है कि परम्परा की शुरुआत तो हुई। मैं चाहता हूं जनता ऐसे पोंगा पण्डितों से खूब प्रश्न करे ताकि इनकी वास्तविकता समाज के सामने आ सके। जो खरे स्वर्ण की भांति हैं वे और उजले होकर निखर जाएंगे और जो खार हैं वे  जल कर नष्ट हो जाएंगे, मेरे देखे खार का जल जाना श्रेयस्कर ही है।
राधे-राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)