रविवार, 23 जुलाई 2017

मन्दिरों की अनोखी परम्पराएँ


श्रीजगन्नाथ मन्दिर पुरी (ओड़ीसा)- 
श्रीजगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल भगवान श्री जगन्नाथ को खिचड़ी का बालभोग लगाया जाता है। प्राचीनकाल में एक भक्त कर्माबाई प्रात:काल बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाती थी। कथानुसार ठाकुर जी स्वयं बालरूप में कर्माबाई की खिचड़ी खाने आते थे लेकिन एक दिन कर्माबाई के यहाँ एक साधु मेहमान हुआ। उसने जब देखा कि कर्माबाई बिना स्नान किए ही खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को भोग लगा देती हैं तो उसने उन्हें ऐसा करने से मना किया और ठाकुर जी का भोग बनाने व अर्पित करने के कुछ विशेष नियम बता दिए। अगले दिन कर्माबाई ने इन नियमों के अनुसार ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाई जिससे उन्हें देर हो गई और वे बहुत दु:खी हुई कि आज मेरा ठाकुर भूखा है। ठाकुर जी जब उनकी खिचड़ी खाने आए तभी मन्दिर में दोपहर के भोग का समय हो गया और ठाकुर जी जूठे मुँह ही मन्दिर पहुँच गए। वहाँ पुजारियों ने देखा कि ठाकुर जी मुँह पर खिचड़ी लगी हुई है, तब पूछने पर ठाकुर जी ने सारी कथा उन्हें बताई। जब यह बात साधु को पता चली तो वह बहुत पछताया और उसने कर्माबाई से क्षमायाचना करते हुए उसे पूर्व की तरह बिना स्नान किए ही ठाकुर जी के लिए खिचड़ी बनाकर ठाकुर जी को खिलाने को कहा। आज भी पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में प्रात:काल बालभोग में खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि यह कर्माबाई की ही खिचड़ी है। -
जगन्नाथ मन्दिर पुरी (उड़ीसा)- भगवान को बुखार-
ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ को ठण्डे जल से स्नान कराया जाता है। इस स्नान के बाद भगवान को ज्वर (बुखार) आ जाता है। १५ दिनों तक भगवान जगन्नाथ को एकान्त एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जहां केवल उनके वैद्य और निजी सेवक ही उनके दर्शन कर सकते हैं। इसे "अनवसर" कहा जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को फ़लों के रस, औषधि एवं दलिया का भोग लगाया जाता है। भगवान स्वस्थ होने पर अपने भक्तों से मिलने रथ पर सवार होकर निकलते हैं जिसे जगप्रसिद्ध "रथयात्रा" कहा जाता है। "रथयात्रा" प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकलती है।
ब्रज की अनोखी परम्परा-
ब्रज के मन्दिरों में एक अनोखी परम्परा है। जब वहाँ कोई भक्त मन्दिर के विग्रह के लिए माला लेकर जाता है तो वहाँ के पुजारी उस माला को विग्रह से स्पर्श कराकर उसी भक्त के गले में पहना देते हैं। इसके पीछे एक बड़ी प्रीतिकर कथा है। श्रुति अनुसार अकबर के समय की बात है एक वैष्णव भक्त प्रतिदिन श्रीनाथ जी के लिए माला लेकर जाता था। एक दिन अकबर का सेनापति भी ठीक उसी समय माला लेने पहुँचा जबकि माली के पास केवल १ ही माला शेष थी। वैष्णव भक्त और अकबर के सेनापति दोनों ही माला खरीदने के लिए अड़ गए। इस धर्मसंकट से मुक्ति पाने के लिए माली ने कहा कि जो भी अधिक दाम देगा उसी को मैं यह माला दूँगा। दोनों ओर से माला के लिए बोली लगनी आरम्भ हो गई। जब माला की बोली अधिक दाम पर पहुँची तो अकबर के सेनापति बोली बन्द कर दी। अब वैष्णव भक्त को अपनी बोली के अनुसार दाम देने थे। भक्त तो अंकिचन ब्राह्मण था उसके पास इतना धन नहीं था सो उसने उसके घर सहित जो कुछ भी पास था वह सब बेच कर दाम चुकाकर माला खरीद ली। जैसे ही उसने यह माला श्रीनाथजी की गले में डाली वैसे ही उनकी गर्दन झुक गई। श्रीनाथजी को झुके देख उनके सेवा में लगे पुजारी भयभीत हो गए। उनके पूछने पर जब श्रीनाथ जी ने सारी कथा उन्हें बताकर उस भक्त की सहायता करने को कहा। जब पुजारियों ने उस भक्त का घर सहित सब व्यवस्थाएं पूर्ववत की तब जाकर श्रीनाथ जी सीधे हुए। तब से आज तक ब्रज में यह परम्परा है कि भक्त की माला श्रीविग्रह को स्पर्श कराकर उसे ही पहना दी जाती है। किंवदंतियों अनुसार यह घटना गोवर्धन स्थित जतीपुरा मुखारबिन्द की है। ऐसी मान्यता है कि नाथद्वारा में जो श्रीनाथ जी का विग्रह है वह इन्हीं ठाकुर जी का रूप है।
मन्दिरों के रोचक किस्से-
- राजस्थान के डाकौर के रणछोड़दास जी मन्दिर में भगवान को श्रृँगार में आज भी पट्टी बाँधी जाती है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त को मार से बचाने के लिए उसकी चोटें अपने शरीर पर ले ली थीं।
- उदयपुर के समीप श्रीरूप चतुर्भुजस्वामी के मन्दिर में आज भी वहाँ के राजा का प्रवेश वर्जित है। मान्यता है कि यहाँ भगवान ने अपने भक्त देवाजी पण्डा की अवमानना करने पर राजा को श्राप दे रखा है कि वे उनके मन्दिर में प्रवेश ना करें और ना ही उनके दर्शन करें।
- ओरछा के रामराजा सरकार का मुख्य विग्रह उनके लिए बनाए गए मन्दिर के स्थान पर राजमहल के रसोईघर में स्थित है। कथानुसार यहाँ की महारानी गणेशदेई जब भगवान श्रीराम को अयोध्या लाने गई तो श्रीराम प्रभु ने साथ चलने के लिए अपनी दो शर्ते रखीं, पहली कि वे केवल महारानी की गोद में बैठकर ही यात्रा करेंगे और जहाँ वे उन्हें अपनी गोद से उतारेंगी वे वहीं स्थापित हो जाएँगे। दूसरी शर्त थी कि महारानी केवल पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करेंगी। ओरछा पहुँचने पर महारानी अपनी पहली शर्त भूल गई क्योंकि तब तक मन्दिर अपूर्ण था इसलिए महारानी गणेशदेई ने श्रीराम का विग्रह अपनी गोद से उतारकर महल के रसोईघर में रख दिया। अपनी शर्त के अनुसार भगवान राम महारानी की गोद से उतरते ही वहीं स्थापित हो गए। तब से आज तक यह विग्रह महल के रसोईघर में ही स्थापित है। यद्यपि वर्तमान में उसे मन्दिर का रूप दे दिया गया है।
-उज्जैन स्थित महाकाल व ओरछा स्थित रामराजा सरकार को राजा माना जाता है और राज्य सरकार द्वारा गार्ड आफ़ आनर दिया जाता है।
- हरदा जिले के नेमावर स्थित सिद्धनाथ जी के सिद्धेश्वर मन्दिर का मुख्य द्वार प्रवेश द्वार से उल्टी दिशा में है। मन्दिर प्राँगण में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम मन्दिर का पार्श्व भाग दिखाई देता है। मान्यता है कि महाभारत काल में एक विशेष पूजा के चलते प्रात:काल सूर्य की किरणें मन्दिर में प्रवेश ना कर पाएँ इसलिए महाबली भीम ने इस मन्दिर को घुमा दिया था। यह मन्दिर आज तक उसी स्थिति में है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

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