मंगलवार, 29 अगस्त 2017

"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"


सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।


जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली
जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली


जनता? हाँ, लम्बी-बड़ी जीभ की वही कसम
जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है
सो ठीक, मगर आख़िर इस पर जनमत क्या है?
है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?


मानो जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं
जब चाहो तभी लो उतार सजा लो दोनों में
अथवा कोई दुधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में


लेकिन होता भूडोल, बवँडर उठते हैं
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है


हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है
जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है।


अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजेय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं


सबसे विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो


आरती के लिए तू किसे ढूँढता है मूरख
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में


फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

 

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर"

 

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

पत्रकारिता या बाज़ार !

आज तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की ख़बर देखने के लिए जब टी.वी. चालू किया तो मन अत्यन्त विषाद से भर गया। ये मीडिया समूह जो देश की हर घटना पर न्यायाधीश की तरह व्यवहार करते और यदा-कदा अपने चैनलों पर नैतिकता की बातें करते हैं क्या सारी नैतिकता अन्य व्यक्तियों के लिए हैं स्वयं उनके लिए नैतिकता का कोई मापदण्ड नहीं है? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि आज तीन तलाक से जुड़ी खबरें दिखाते वक्त लगभग हर न्यूज़ चैनल केवल एक लाईन बोलकर ब्रेक ले रहा था। क्या यही नैतिकता तकाज़ा है कि जब देशवासी इतनी अहम ख़बर को देखने के लिए अपना बहुमूल्य समय निकालकर न्यूज़ चैनल देख रहे हैं आप सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लाईन बोलकर उन्हें लम्बे-लम्बे विज्ञापन दिखाए चले जा रहे हैं। मीडिया समूहों की आर्थिक विवशता मैं समझ सकता हूँ लेकिन उसके लिए पूरा दिन पड़ा है, कभी-कभी तो देशभक्ति व राष्ट्रवाद का पाठ दूसरों को पढ़ाने के स्थान पर स्वयं भी पढ़ लिया करें। आज के दौर में दूरदर्शन को छोड़कर एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ज़रा करीने से ख़बरें प्रसारित करता हो। पत्रकारिता का तमाशा बनाकर रख दिया है, और कैमरे के सामने तेवर देखिए; माईक आडी हाथ में लेते ही बन बैठे निर्णायक, ना प्रश्न पूछने का सलीका, ना बहस-मुबाहिसे की तमीज़। आम आदमी करे भी तो क्या करे वह भी तो इसी मीडिया से आकर्षित है, लेकिन कभी-कभी बड़ी कोफ़्त होती है इस प्रकार की पत्रकारिता से। यदि कुछ पत्रकारों व चैनलों को छोड़ दिया जाए तो यह पत्रकारिता के पतन का दौर है। मैं इस प्रकार की पत्रकारिता की निन्दा व भर्त्सना करता हूँ। यही कर सकता हूँ  और क्या....टी.वी. बन्द कर सकता था सो कर दिया और बैठ गया सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मैकाले इस देश की आजादी का पिता है- ओशो

- स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति-

इस देश में में क्रांति न होती अगर मैकाले न हुआ होता। लोग कहते हैं कि मैकाले ने इस देश को गुलाम बनाया और मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि मैकाले ही इस देश की आजादी का पिता है। अगर अंग्रेजों ने कोशिश न की होती शिक्षा देने की इस देश के लोगों को,यहां कभी क्रांति न होती । क्योंकि क्रांति आई शिक्षित लोगों से, अशिक्षित लोगों से नहीं, पंडित-पुरोहितों से नहीं, वेद के, उपनिषदों के ज्ञाताओं से नहीं–जो लोग पश्चिम से शिक्षा लेकर लौटे, जो वहां का थोड़ा रस लेकर लौटे। सुभाष ने लिखा है कि जब मैं पहली दफा यूरोप पहुंचा और एक अंग्रेज चमार ने मेरे जूतों पर पालिश किया तो मेरे आनंद का ठिकाना न रहा। अब जिसने अपने जूतों पर अंग्रेज को पालिश करते देखा हो, वह वापिस आकर इस देश में अंग्रेज के जूतों पर पालिश करे, यह संभव नहीं। अब मुश्किल खड़ी हुई। मैकाले इस देश की आजादी का पिता है। उसी ने उपद्रव खड़ा करवाया। अगर मैकाले इस देश के लोगों को अंग्रेजी शिक्षा न देता,पढ़ने देता उन्हें संस्कृत मजे से और पाठशालाओं में रटने देता उनको गायत्री,कोई हर्जा होने वाला नहीं था। वे अपना जनेऊ लटकाये, अपनी घंटियां बजाते हुए शांति से अपने भजन-कीर्तन में लगे रहते। उसने लोगों को पश्चिम में जो स्वतंत्रता फली है उसका स्वाद दिलवा दिया। एक दफा स्वाद मिल गया, फिर अड़चन हो गई। अभी तुम देखते हो, ईरान में क्या हो रहा है? ईरान के सम्राट को जो परेशानी झेलनी पड़ रही है वह उसके खुद ही के कारण। ईरान अकेला मुसलमान देश है जहां शिक्षा का ठीक से व्यापक विस्तार हुआ है और ईरान के शहंशाह ने शिक्षा पर बड़ा जोर दिया। ईरान समृद्ध है, शिक्षित है–सारे मुसलमान देशों में! और यही नुकसान की बात हो गई। अब वे ही शिक्षित लोग और समृद्ध लोग अब चुप नहीं रहना चाहते; अब वे कहते हैं, हमें हक भी दो, अब हमें प्रजातंत्र चाहिए; अब हम राज्य करें, इसका भी हमें मौका दो। और कोई मुसलमान देश में उपद्रव नहीं हो रहा है, क्योंकि लोग इतने गरीब हैं, इतने अशिक्षित हैं, मान ही नहीं सकते, सोच ही नहीं सकते कि हमें और राज्य की सत्ता मिल सकेगी, असंभव! असंभव को कौन चाहता है? जब संभव दिखाई पड़ने लगती है कोई बात, जब हाथ के करीब दिखाई पड़ने लगती है कि थोड़ी मेहनत करूं तो मिल सकती है, तब उपद्रव शुरू होता है। इस देश में शूद्र हजारों साल से परेशान हैं, कोई बगावत नहीं उठी। उठ नहीं सकती थी। अंबेदकर जैसे व्यक्ति में बगावत उठी, क्योंकि शिक्षा का मौका अंग्रेजों से मिला।

- आचार्य रजनीश "ओशो"

सोमवार, 14 अगस्त 2017

आजादी की ख़बर



व्रत या अनशन

जन्माष्टमी कब मनाई जाए इसे लेकर पण्डितों में शीत युद्ध जारी है। विद्वत्तजन धर्मग्रन्थों को खँगाल-खँगालकर अपने-अपने मतों के समर्थन में प्रमाण जुटा रहे हैं। सभी व्रतों के नियम और तिथियों के निर्धारण में ग्रन्थों के माध्यम से प्रमाण स्वरूप अत्यंत क्लिष्ट सँस्कृत के श्लोक इत्यादि प्रस्तुत कर रहे हैं। ठीक भी है, अधिकांश कर्मकाण्डी विद्वानों से और कोई आशा की भी नहीं जा सकती क्योंकि रट्टू तोते की तरह धर्मग्रन्थों को रटना और रटते-रटते बिना समझे अर्थ का अनर्थ करना उनकी आदत है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। जन्माष्टमी व्रत के सम्बन्ध में ये तथाकथित विद्वान बार-बार व्रत के नियम इत्यादि बता रहे हैं लेकिन क्या यह जानते भी हैं कि व्रत कहते किसे हैं? मेरा इन सभी महानुभावों से कहना है कि केवल भूखे रहने और अन्न ना खाने को व्रत नहीं कहते, यह तो अनशन हुआ। व्रत तो उसे कहते हैं कि जब आप परमात्मा के प्रेम में इस भाँति निमग्न हों कि आपको खाने-पीने की सुध ही भूल जाए, सच्चे अर्थों में व्रत यही है। अब इस प्रकार के प्रेमासिक्त व्रत में तिथि कहाँ बाधक है? भला प्रेम करने के लिए भी कोई नियम या रीति होती है? बाबा पलटूदास कहते हैं- "लगन मुहूरत झूठ सब, और बिगाड़े काम। पलटू शुभ-दिन; शुभ-घड़ी याद पड़ै जब नाम॥" इस प्रकार का हार्दिक व्रत किसी भी दिन किया जाए सफ़ल होता है। वहीं बलात् व दमनपूर्वक भूखा रहने के लिए खूब मुहूर्त्त इत्यादि साध भी लिया जाए तो व्यर्थ है। अत: मेरा सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है कि वे परमात्म प्रीति का भाव साधैं, मुहूर्त्त इत्यादि के फ़ेर में ना उलझें। मुहूर्त्त सधे तो ठीक, ना सधे तो भी ठीक। एक शायर ने क्या खूब कहा है-" सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर। जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर॥
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
राधे-राधे
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

रविवार, 13 अगस्त 2017

आजाद भारत की प्रथम मुद्रा

एक लाख का नोट-1
एक लाख का नोट-2
एक हजार का नोट
सौ रु. का नोट-1
सौ रु. का नोट-2
दस रु. का नोट
पाँच रु. का नोट

आजादी का सच

क्या आप जानते हैं भारत को स्वतन्त्रता कब प्राप्त हुई? आप कहेंगे- "हाँ", 15 अगस्त 1947 को। यदि मैं कहूँ कि आपका जवाब गलत है, तो आप चौंक जाएँगे। लेकिन इतिहास बताता है भारत की आजादी का शँखनाद 30 दिसम्बर सन 1943 को अण्डमान-निकोबार से हो गया था। 30 दिसम्बर सन 1943 के ही दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम आजादी की घोषणा करते हुए तिरंगा फ़हराया था। यह भारत की आज़ादी का शँखनाद था। विडम्बना है कि काँग्रेसी शासन ने विद्वेषता के चलते इस अति-महत्त्वपूर्ण तथ्य को नज़रअंदाज़ किया।
विश्व  ज्ञानकोश भी इस बात की पुष्टि करता है-
"21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया।"

-(साभार: विश्व ज्ञानकोश)

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

पानसिंह तोमर: एथलीट या डकैत

जब भी  फ़िल्म "पानसिंह तोमर" देखता हूं तो मुझे बड़ी पीड़ा होती है। आखिर कैसे हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ने एक अन्तर्राष्ट्रीय एथलीट को डकैत बना दिया। आप भी जानिए कहानी "पानसिंह तोमर" की-
- पानसिंह तोमर वर्ष 1949 फ़ौज में भर्ती हुए।
- पानसिंह तोमर वर्ष 1958 में स्टीपल चेज़ (बाधा दौड़) के नम्बर 1 खिलाड़ी बनें।
- पानसिंह तोमर 7 वर्षों तक लगातार नेशनल चैम्पियन रहे।
- पानसिंह तोमर ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 30 पदक जीते।
- पानसिंह तोमर ने वर्ष 1979 में फ़ौज से रिटायरमेन्ट लिया।
- पानसिंह तोमर अपनी 1 बीघा जमीन वापस लेने के लिए बागी बने।
- पानसिंह तोमर का एनकाउण्टर 1 अक्टूबर 1981 को पुलिस अधिकारी एम. पी. सिंह चौहान ने किया।
- पानसिंह तोमर को पहली गोली हवलदार त्रिभुवन सिंह की लगी।

इनका कहना है-
* पानसिंह बहुत ही अच्छा और हंसमुख इंसान था मगर हालात के कारण उसे डाकू बनना पड़ा
  (मिल्खा सिंह)
* पानसिंह शराफ़त के पुतले थे- जे.एस. सैनी (पानसिंह के कोच व पूर्व नेशनल कोच)
* पानसिंह तो फ़ौज का आदमी था; अच्छा आदमी था, जमीन वापस दिला देते तो डकैत नहीं बनता।
  (दस्यु  मोहर सिंह गुर्जर)

पानसिंह का परिवार


मुठभेड़ के बाद पानसिंह की आखिरी तस्वीर-
मृतक पानसिंह तोमर

                                           पानसिंह का एनकाउण्टर करने वाले पुलिस अधिकारी-

एम. पी. सिंह चौहान


शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

किसमें कितना है दम



            भारत                      -            चीन

 

1.    सेना (लाख में) -            13       -                 23
2.    हमलावर विमान-       809       -             1,385
3.    लड़ाकू विमान-           679       -             1,230
4.    मालवाहक विमान-      857     -               782
5.     टोड आर्टिलरी-        7,414       -            6,246
6.    मल्टीपल लांच
      राकेट सिस्टम -           292      -           1,770
7.    विमानवाहक-              01       -               01
8.    डिस्ट्रायर-                    10       -              32 
9.     फ्रिगेट-                       14       -               48
10.    पनडुब्बी-                   14      -               68



         भारत                      -           पाकिस्तान

 


1.    सेना (लाख में) -            13       -                6.3
2.    हमलावर विमान-        809      -               394
3.    लड़ाकू विमान-            679       -               301
4.    मालवाहक विमान-     857      -               261
5.     टोड आर्टिलरी-        7,414        -            3,278
6.    मल्टीपल लांच
      राकेट सिस्टम -          292        -              134
7.    विमानवाहक-             01        -                   0
8.    डिस्ट्रायर-                  10        -                   0 
9.     फ्रिगेट-                     14        -                 10
10.    पनडुब्बी-                 14        -                  5


-(इण्डिया टुडे से साभार)           

पाकिस्तान या चीनिस्तान...!



जानिए कहाँ-कहाँ से गुजरेगा "चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा" (CPEC)-
1. रशकई इकोनामिक जोन, एम-1, नौशेरा, खैबर पख़्तूनख्वा
2. चाइना सेज, ढाबेजी, सिन्ध
3. पँजाब-चाइना इकोनामिक जोन, एम-2, शेखपुरा, पँजाब (पाक)
4. भिंबर औद्योगिक परिक्षेत्र, पीओके
5. मोहम्मद मार्बल सिटी, खैबर पख़्तूनख्वा
6. मोक्पोंदास सेज, गिलगित-बल्तिस्तान, पीओके

चीन की पाकिस्तान में प्राथमिक उर्जा परियोजनाएँ -
1. कराची के पोर्ट कासिम में 660 मेगावाट के दो कोयला चालित पावर प्लाँट2. खैबर पख़्तूनख्वा के नारन में 870 मेगावाट का सुकी किनारी पनबिजली केन्द्र
3. पँजाब के साहीवाल में 660 मेगावाट के 2 कोयला चालित पावर प्लाँट
4. सिंध के थार में 330 मेगावाट के 4 कोयला चालित पावर प्लाँट
5. बलूचिस्तान के हब में 1320 मेगावाट का कोयला चालित पावर प्लाँट
6. ग्वादर में 300 मेगावाट की आयातित कोयला आधारित उर्जा परियोजना
7. बहावलपुर में 1000 मेगावाट का कायदे-आज़म सौर पार्क
8. पीओके के करोट में 750 मेगावाट का पनबिजली केन्द्र
9. पीओके में 1,100 मेगावाट की कोहाला पनबिजली परियोजना

चीन-पाकिस्तान के मध्य व्यापार-
- 2015-16 में बढ़कर 13.77 अरब डालर पर पहुँच गया है जो वर्ष 2007 में 4 अरब डालर था।- मास्टर प्लान के अनुसार पाकिस्तान की करीब 65,000 एकड़ भूमि चीन को पट्टे में दी जाएगी जिस पर वह   कृषि परियोजनाओं का सँचालन करेगा। ऐसी 17 परियोजनाएँ सूचीबद्ध हैं।

-(इण्डिया टुडे से साभार)